यहाँ के हम सिकंदर – नया धारावाहिक


प्रेमबाबू शर्मा

‘यहाँ के हम सिकंदर’ कहानी है हिन्दुस्तान के हर कोने में बसने वाले छोटे शहरों…. क़स्बों की…. और उनमें पल-पल धड़कते उन युवाओं कि, जिनके जेबें भले ही छोटी हों मगर सपने इतने बड़े, कि अगर खोल दिए जाएँ तो पूरी दुनियां ढक लें, और इतने छोटे-छोटे भी कि समेट लिए जायें ती एक नर्म तकिया बन जाए ।

सैम्यूल,(टॉम अल्टर) एक अंग्रेज़ हैं। जब सारे अंग्रेज़ हिंदुस्तान छोड़ कर जा रहे थे, वो इसलिए बिजनौर से नहीं गए कि उनके पिता को बिजनौर कि शामें बहुत पसंद थी… अब सैम्यूल धुली हुई हिन्दुस्तानी बोलते हैं, बिजनौर के सरकारी स्कूल GIC में इतिहास पढाते हैं… और नुक्कड़ के चाय खाने पर बैठके दोस्तों से गप्पें मारते हैं ।

उनका मानना है कि सपने इसलिए होते हैं कि वो रेत कि तरह आँखों में चुभते रहे … कि उनके पुरे होने तक हमें नींद ना आये ।

इस कहानी में अली (सक्षम दायमा) भी है जो अपने बाप कि वेल्डिंग कि दुकान पर बैठता तो है, मगर आज भी कोई किताब उसके हाथ आ जाए तो दिल स्कूल के गलियारों में भटकने लगता है… एक आयशा (अनु नैन) है, जिसके पुराने से घर में ढेर सारी अलमारियाँ हैं… मगर कोई इतनी बड़ी नहीं कि आयशा के सपने उसमे समा सकें… आयशा खेलना चाहती है, जीतना चाहती है और पूरी दुनियां में अपनी पहचान बनाना चाहती है… मगर समाज का डर, मौहल्ले कि नज़रे, माँ बाप की फ़िक्र रास्ते में आ कर खड़ी होती है वो उड़ना चाहती है मगर हवाओं का रुख उसके खिलाफ़ है ।

मगर आयशा जानती है की उसने ठान लिया तो एक न एक दिन वो मंजिल पा ही लेगी…. उसी का दोस्त है, राधे (ध्रुव राज शर्मा) मस्तमौला, हसमुख और थोड़ा सा पागल… वो हर महफ़िल कि जान है, जहाँ होता है वहाँ ठंडी हवा के झोंके की तरहाँ सब को मदमस्त कर देता है… वो पढता तो GIC यानी Government Inter college में है लेकिन उसकी दुनिया GIC की boundary पर खत्म नहीं होती ।

उसे बिजनौर के सबसे बड़े इंग्लिश मीडियम स्कूल, सनशाईन पब्लिक स्कूल की छात्रा, सुहानी (तन्वी चतुर्वेदी) बहुत अच्छी लगती है… सुहानी के रिक्शे का अपनी साईकिल से पीछा करना उसका सबसे बड़ा शौक है… सुहानी के रिक्शे के पीछे उसने जितनी साईकिल दौडाई है, अगर एक सीध में चलाई होती तो अब तक पूरी दुनिया का चक्कर लगा कर वापस बिजनौर पहुच गया होता…

बिजनौर और खासतौर पर Government inter college के इर्दगिर्द घूमता हमारा यह सीरियल ‘यहाँ के हम सिकंदर’ किसी स्टूडियो में बसे नकली गाँव कि तरफ सिर्फ सच कि छाया नहीं बल्कि एक जीते – जागते शहर और उसमें बसी जिंदगियों कि बात करता है…

यह सीरियल पूरी मौज-मस्ती के बावजूद कुछ बेहद अहम मुद्दे हमारे सामने रखता है यह सच भी है कि आज भी इस देश के 80% बच्चे GIC जैसे स्कूलों से निकल कर डॉक्टर, इंजिनियर, जज, लेखक, और जाने क्या-क्या बनते हैं और इस चमकते दमकते और पल पल धड़कते मुल्क में कुछ और रोशनी भरते हैं……दिलीप सूद बतौर निर्माता ।

स्कूल डेजस सीरीसल के अलावा फिल्में भी बना चुके है अब यह धारावाहिक भी स्कूल के बच्चों पर एक अलग प्रयोग है।

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