इतिहास के अनछूए पन्ने : पालम का चौधरवाड़ा बुर्ज़


अनुराग रंजन सिंह

यह एक सुखद अनुभूति है कि द्वारका जिस जगह पर बसा है वह दिल्ली के सातवें मुगलशासक बहादुर शाहआलम की रियासत का वह महत्त्वपूर्ण हिस्सा था, जहां से अन्न के रूप में किसानों से कर वसूला जाता था। शाहआलम प्रथम, आलमशाह और शहज़ादा मुअज्ज़म कहलाने वाले बहादुरशाह, दिल्ली के छठे बादशाह औरंगजे़ब के दूसरे पुत्र थे। बहादुर शाह प्रथम को ही ‘शाहआलम प्रथम’ या ‘आलमशाह प्रथम’ के नाम से भी जाना जाता है।

पालम का चौधरवाड़ा बुर्ज़



 बहादुरशाह प्रथम ने उत्तराधिकार के युद्ध के समाप्त होने के बाद सबसे पहले राजस्थान की ओर रुख़ किया। उन्होंने मारवाड़ के राजा अजीत सिंह को पराजित कर मनसब तथा महाराज की उपाधि प्रदान की लेकिन बहादुरशाह प्रथम के दक्षिण जाने पर अजीत सिंह, दुर्गादास और जयसिंह कछवाहा ने मेवाड़ के महाराज अमरजीत सिंह के नेतृत्व में अपने को स्वतंत्र घोषित कर लिया और साथ ही साथ राजपूताना संघ का गठन किया। बहादुरशाह प्रथम ने इन राजाओं से संघर्ष करने से बेहतर संधि करना ही उचित समझा और उसने इन शासकों को मान्यता दे दी। 26 फरवरी 1712 को बहादुरशाह प्रथम की मृत्यु हो गई।

 पालम गांव के निवासी चैधरी भूप सिंह कहते हैं कि उनके पूर्वज राजस्थान के टाकटोडा से आकर दिल्ली के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में कैसे बस गए इसके पीछे भी एक कहानी है। वह बताते हैं कि उनके पूर्वज बैलगाड़ी पर एक पवित्र पत्थर लाद कर टाकटोडा से दिल्ली आ रहे थे। वह पत्थर अचानक बैलगाड़ी से ज़मीन पर गिर पड़ा, जहां वह पत्थर गिरा वहीं पर उनके पूर्वजों ने दादा देव मंदिर की स्थापना की और उसके आसपास ही अपना बसेरा बना लिया  ।
  
चौधरवाड़ा के नंबरदार राजकुमार सोलंकी बताते हैं कि लगभग 13 सौ साल पहले राजस्थान के जमींदार राजपूत समुदाय का पलायन उत्तरी-पश्चिमी दिल्ली की ओर हुआ। मुगलकाल में दिल्ली के इस उत्तर-पश्चिमी हिस्से को पप्पनकला के नाम से जाना जाता था। आज़ भी पप्पनकला तो है लेकिन आधुनिक विकास एवं विस्तार ने इसकी सीमा को बहुत हद तक समेट दिया है। पालम, डाबरी, नसिरपुर, असलातपुर, बिंदापुर, शाहाबाद, बापडोला, बागडोला और पुटकला ऐसे गांव हैं जिनसे द्वारका चारों ओर से घिरा है। उन्होंने बताया कि द्वारका के आसपास के गांवों में बसे किसानों को सरकार द्वारा ज़मीन अधिग्रहण का नोटिस 1984 में दिया गया। 1986 में किसानों को ज़मीन का मुआवजा मिला और 1987-88 में पप्पनकला का नाम बदलकर द्वारका रखा गया।
  

चौधरी करार सिंह का समाधि स्थल

श्री सोलंकी बताते हैं कि मुगलकाल में मनसब प्रणाली मुगल साम्राज्य की रीढ़ समझी जाती थी जिसके माध्यम से भारी राजस्व इकट्ठा किया जाता था। वह बताते हैं कि मुगलकाल में पप्पनकला के मनसबदार के तौर पर उनके पूर्वज चैधरी करार सिंह का नाम आज़ भी उनकी पीढि़यों के लिए ऐतिहासिक घरोहर का विषय है।

चौधरी करार सिंह का समाधि स्थल और उनके कि़ले का भूला-विसरा रूप इतिहास के पन्नों पर उकेरा गया हैं या नहीं यह एक अलग मुद्दा है लेकिन उसे अभी तक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में स्वीकारा नहीं गया है यह एक बड़ी बिडम्बना है। इस किले के चार बुर्जों में से आज़ केवल एक मात्र बुर्ज अपनी ज़र्र-ज़र्र हालत में सदियों पुरानी यादों को बयां कर रहा है।

भले ही द्वारकावासी द्वारका से जुड़े इस इतिहास पर ग़ौर न करें लेकिन हर नज़रिए से द्वारका की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अपने आप में गौरवपूर्ण है, जो इतिहास की गौरवगाथा सुनाते रहेंगे।

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