आप और आपका बालक

डॉ एम् सी जैन 

प्रत्येक बालक कुछ जन्म जात गुणों के साथ इस संसार में आता है | माता – पिता, समाज और पाठशाला का ये कर्तव्य है कि जन्म जात शक्तियों के विकास के लिए बच्चे को उचित वातावरण प्रदान करें | ऐसा देखने में आया है कि माता पिता और अभिभावक बालक की प्रतिभा को आरम्भ में पहचान नहीं पाते | उनका व्यव्हार बालक को समस्यात्मक बना देता है | अतः ये हमारे लिए जरूरी है कि हम अपने बालक की प्रतिभा को पहचाने ओर उसकी प्रतिभा के विकास के लिए प्रयास करें. |

प्रत्येक बालक जब जन्म लेता है तो कुछ ऐसे गुण होते है, जो जन्म जात रहते हैं तथा कुछ ऐसे जो वह वातावरण से प्राप्त करता है. |जो गुण बालक में जन्म जात हैं उसे आगे बढाने के लिए उचित वातावरण का होना अत्ययंत आवश्यक है | प्राय: यह देखा गया है कि इन जन्म जात गुणों को माता पिता ठीक से समझ कर उसके अनुरूप वातावरण नहीं प्रदान कर पाते हैं फलस्वरूप बालक की क्षमता परिवेशीय कारणों से अवरुद्ध हो जाती है और धीरे धीरे उसमे ग्रंथियां बनने लगती हैं जो असमायोजन को जन्म देती हैं. | इस कारण से यह परम आवश्यक है कि माता पिता बच्चे के जन्म जात गुणों को भली भांति समझ कर उसके अनुरूप वातावरण प्रदान करने की चेष्टा करें. जिससे वह एक सफल नागरिक बन सके | माता पिता , अभिभावक अथवा शिक्षक को चाहिए कि प्रतिभाशाली बालकों की पहचान कर उनके साथ व्यव्हार में विशेष सावधानी रखें कियोंकि एसे बच्चे सामान्य की अपेक्षा अधिक संवेदन शील होते हैं | इनके साथ व्यव्हार में थोड़ी सी विसंगति इनके व्यक्तित्व को कुंठित कर देती है ओर एसे बालक समस्यात्मक बन जाते हैं | बालक पर माता पिता अथवा शिक्षक का अंकुश न रहने पर वह एक समस्यात्मक बालक के रूप में विकसित होने लगता है कभी कभी उसके माता पिता के तनाव पूर्ण संवंधो ओर घर के प्रतिकूल वातावरण का ऐसा प्रभाव पड़ने लगता है कि बालक के व्यक्तित्व की जटिलताये बढती चली जाती हैं |ये कहना नितांत सही है कि वंशानुक्रम या जन्म जात योग्यताएं ही प्रधान नहीं हैं वरन परिवेक्षीय कारणों का भी अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है | डेविड अब्राहम के अनुसार ” बालक क्या कर सकता है, ये वंशानुक्रम से निश्चित होता है ओर बालक क्या करता है, ये वातावरण निश्चित करता है | बालक की शक्तियां वंशानुक्रम में होती हैं औरे इन शक्तियों को बाहर निकालना वातावरण का कार्य है |”

माता पिता,  अभिभावक अथवा शिक्षक के लिए परामर्श

१ अभिभावकों को चाहिए कि बालक को घर के बोझिल वातावरण से दूर रखने का प्रयास करें, जिससे उसके व्यक्तित्व का विकास पूर्ण रूप से हो सके.

 २. कभी कभी माता पिता में वैमनस्यता होने पर भी बालक के प्रति सभी कर्तव्यों का पालन सुचारू रूप से करें. |उसे एक अच्छा नागरिक बनाने के लिए भरसक प्रयत्न करें, उसे अधिक से अधिक स्नेह प्रदान करें| उसके साथ नियमित रूप से कुछ समय व्यतीत करें तथा जीवन की वास्तविकताओं के निकट जाने का प्रयास करें | कुछ समय बाहरी सैर सपाटे में साथ ले जाया करें जिससे बालक में सुरक्षा की भावना मजवूत हो सके. |

  ३. उसकी इच्छा को समझने का प्रयास करें, और संभव हो सके तो उसकी पूर्ति अवश्य करें

 ४. निरर्थक व्यय पर अंकुश लगाने के लिए उसे नियमित जेब खर्च ही दें |

 ५. उसकी छोटी छोटी सफलातायों की प्रशंसा कर उसे प्रोत्साहित करें | साथ ही उसके हर एक कार्य में रूचि लें, जिससे उसे अनुभव हो कि मेरे कार्यों तथा गतिविधियों में माता पिता भी समय लगाते हैं |

 ६.  उसकी रूचि के अनुकूल ही वैज्ञानिक विषयों का चयन कर अध्ययन की सुविधा दी जाएँ, जिससे बालक की रचनात्मक क्षमता का विकास हो सके तथा घर के सदस्यों में पारस्परिक समझदारी भी विकसित हो सकेगी.

७. उसके अन्दर अनुशासन सम्बन्धी संस्कृति का विकास करने के लिए छोटे छोटे दंड देना भी लाभकारी होगा

८. स्वयं माता पिता भी मनोवैज्ञानिक से संपर्क स्थापित कर व्यव्हार में परिमार्जन लाने की चेष्टा करें |

निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैं कि वंशानुक्रम में उच्च क्षमता प्राप्त कर लेने पर भी बालक के परवेशीय कारक बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं | यदि बालक के माता पिता अथवा अन्य पारवारिक सदस्यों के मध्य सोहार्द्यपूर्ण संवंधो का अभाव है, तो यही उच्च क्षमता वाला बालक आक्रोशपूर्ण व्यक्तित्व वाला बालक बन जाता है , तथा उसकी योग्यताएँ व क्षमताएं अभाव में कुंठित हो रह जाती हैं |अतः प्रत्येक माता पिता के लिए यह आवश्यक है कि किसी बालक के सर्वांगीण विकास के लिए, शारीरिक एवम मानसिक विकास की ओर अधिक से अधिक ध्यान देकर वह सभी सुविधाएँ प्रदान करें, जिससे उसकी जन्म जात क्षमतायों को अधिक से अधिक पल्लवित और पुष्पित करने में योग दान मिल सके |

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