दर्द एक बेटी का

जी. के. सेठी 


माँ मुझे डर लगता है … बहुत डर लगता है
सूरज को रोशिनी आग सी लगती है
पानी की बूँदें भी तेजाब सी लगती है
माँ हवा में भी ज़हर सा घुला लगता है
माँ मुझे छुपा ले…बहुत डर लगता है।

माँ याद है वो कांच की गुडिया जो बचपन में टूटी थी
माँ कुछ ऐसे ही आज मैं टूट गयी हूँ
मेरी गलती कुछ भी ना थी माँ फिर भी खुद से रूठ गयी हूँ
माँ बचपन में स्कूल टीचर की गन्दी नज़रों से डर लगता था
पड़ोस के चाचा के नापाक इरादों से डर लगता था
माँ वो नुक्कड़ के लड़कों की बेख़ौफ़ बातों से डर लगता है
और अब बॉस की वहशी इशारों से डर लगता है।

माँ मुझे छुपा ले बहुत डर लगता है
माँ तुझे याद है तेरे आँगन में चिड़िया सी फुदक रही थी
ठोकर खा कर मैं ज़मीन पर गिर गयी थी
दो बूँद खून की देख के माँ तू भी रो पड़ी थी
माँ तुने तो मुझे फूलों की तरह पाला था
उन दरिंदों का आखिर मैंने क्या बिगाड़ा था
क्यूँ वो मुझे इस तरह मसल कर चले गये
बेदर्द मेरी रूह को कुचल कर चले गये।


माँ तू तो कहती थी अपनी गुडिया को दुल्हन बनायेगी
मेरे इस जीवन को खुशियों से सजायेगी
माँ क्या वो दिन जिंदगी कभी ना लायेगी
माँ क्या अब तेरे घर बारात ना आयेगी??
माँ खोया है जो मैंने क्या फिर से कभी न पाउंगी??

माँ घूरते हैं सब अलग ही नज़रों से
माँ मुझे उन नज़रों से छुपा ले
माँ बहुत डर लगता है मुझे आँचल में छुपा ले।

Leave a Reply