मैं क्यों हूँ।


मधुरिता 

सृष्टि का प्रारंभ तो हमने देखा नहीं ‘शास्त्रों ‘ व ‘पुराणों ‘ मैं पढ़ते अवश्य हैं लेकिन कोई संतोषजनक उत्तर हमें हाथ नहीं लगता। 
दुनिया के हिसाब से माता पिता बच्चों पर इतना ध्यान नहीं दे पाते जिसके परिणाम स्वरुप कंप्यूटर महादेव ही सखा बन बैठे है।  सभी की इच्छा पूर्ण करते हैं – ऐसा प्रतीत होता है मानो कलयुग के अवतारी हैं। 

मनोरंजन टाइम पास और विश्व की जानकारी तक तो ठीक है। कंप्यूटर का अधिक सेवन से वो हमें अपने जैसा भाव शुन्य बना देते हैं। हमारी संबंधों को निभाने में नकारात्मक व्यव्हार करने की आदत सी बन जाती है। बच्चे अपने माँ बाप को बोझ समझते हैं। जवानी में प्यार में  धोखा, पति पत्नी से धोखा, बुढ़ापे मैं अकेलापन,  बच्चे केयर नहीं करते। ये तो हुई बाहरी दुनिया का हिसाब किताब।

अब थोड़ी अन्दर की इच्छा के हिसाब से विचार करे तो हमें पता नहीं चलता भटकाव ही भटकाव की स्थिति मिलती है। गाडी की इच्छा, मकान की इच्छा,  स्वर्णिम भविष्य की इच्छा सभी इच्छा मिलकर खिचड़ी सी बन जाती है। इससे हम वर्तमान की विषम व विपरीत परिस्थिति का ठीक से समाधान नहीं कर पाते हैं ।

क्योंकि अन्दर की इच्छा तो कुछ और ही है। कोई एक चीज है जो शरीर के अन्दर रहती है जिसका भटकाव रहता है। जीवन निरर्थक सा प्रतीत होता है।

बाहर भी है, उसके हिसाब से वो सब जगह है, बराबर है । कैसा भी हो निर्जीव में भी वही है सजीव व् समस्त प्राणी मात्र में वो ही बराबर मात्रा में  है। जब तक अन्दर की इच्छा से अगला कदम नहीं लेंगे तब तक हम उसको महसूस नहीं कर सकते।

हम उसको महसूस कर लेंगे तो क्या होगा –
– तब हमें पता चल जाएगा कि मैं क्यों हूँ ?

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