रिश्तों की बाजीगरी

मधुरिता 

मानसिक पटल से जीव का सम्बन्ध बनाना ही रिश्ता कहलाता है. यह जन्म से ही बनते चले जाते हैं. परिवार से, वातावरण से, इंसान के आलावा जानवर, पेड़ पौधे, जड़ व चेतन, इतना ही नहीं ये रिश्ते लघु से लघु व विभु से विभु तक बन जाते हैं. प्रकृति से लेकर परमात्मा तक इसका कोई ओर छोर नजर नहीं आता.

बच्चों का जन्म लेते ही सबसे पहले संसार उससे रिश्ता जोड़ता है. उससे पहले उसे इसका ज्ञान नहीं होता. माता पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, भाई-बहन आदि सभी रिश्ते दौड़ दौड़ कर उसे अपना परिचय देते हैं.

बड़े होतें हैं तो दोस्त बनते हैं. जिस वातावरण में पले बड़े होते हैं उसी अनुरूप रिश्तो की बाजीगरी का खेल खेलते रहतें हैं. आज के परिवेश में रिश्तों का केवल आवरण मात्र रह गया है. रिश्ते भाव शुन्य व मतलबी हो गए हैं. अपने काम के लिए प्रयोग में लाना हो तो रिश्ता मानते हैं नहीं तो बात भी नहीं करते. सब अपने तक सीमित हो गया है. हम दूसरों के बारे में विचार तक नहीं करते. इसे हमारे फैशन व आधुनिकता व सभ्यता का प्रमाण मान लेते हैं. यह रिश्ता केवल रेत के महल जैसा प्रतीत होने लगता है. केवल दिखावा ही दिखावा रह जाता है. सभी रिश्ते टूटते – बिखरते तथा हम अंत में अकेले रह जाते हैं.

आज किसी से पूछे क्या वो अपने जीवन से संतुष्ट हैं – इसका उत्तर नकारात्मक ही होगा. इसका एक अहम् कारण है – विचारों की स्वतंत्रता. सभी पंछी की तरह आज़ाद होना चाहतें हैं – जरा सोचें क्या ऐसा संभव है. कर्मो के बंधन – नैतिक नियमों – का पालन न करना, वेद- शास्त्रों का अपमान करना – ये सब तो फैशन सा बन गया है. आज सामाजिक प्राणी होते हुए भी अकेले रहने को मजबूर हैं. हर उम्र में डिप्रेशन हो जाता है. जीवन में संघर्ष करने व सहन करने की क्षमता घटती ही जा रही. परिणामतः आत्म हत्या करने की दर बढ़ रही है. इसी तरह चलता रहा तो रिश्ते ख़त्म हो जायेंगे. हमें किसी से मतलब नहीं रह जायेगा, हमारी मदद करने कोई नहीं आएगा.

भगवान् से सम्बन्ध तो बचपन से ही छोड़ रखा है. इसको जोड़ने के लिए हमें वापिस शास्त्रों का ही सहारा लेना पड़ेगा, कोई ओर उपाय तो कारगर साबित होता प्रतीत नहीं होता.

शून्य की अपनी कोई सत्ता नहीं होती वो किसी अंक को साथी बना कर ही अपने को सार्थकता प्रदान करता है. इसी तरह परमात्मा को 1 माने ओर संसार को 0 तो परमात्मा ओर संसार मिल कर अर्थात 1 ओर 0 मिलकर 10 होता है. ( यानि संसार का सम्बन्ध परमात्मा के साथ होने पर दस गुना हो जाता है. बिना परमात्मा यानि 1 के, संसार 0 ही रहेगा, अर्थात रिश्ते 0 हो जायेंगे. अंत में उसे छोड़ना ही पड़ता है. संसार में सभी मिलन का अंत वियोग ही होगा. यह उतना ही सत्य है – जितना जन्म के बाद मृत्यु का होना.

जिसने भी ये फार्मूला अपनाया है, उनका नाम आज भी श्रधा व भक्ति से लिया जाता है – कबीर, प्रह्लाद, राम कृष्ण परमहंस, मीरा, तुलसीदास – असली रिश्तों के बाजीगर तो यही हुए न.

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