देश को तोड़ने नहीं बल्कि जोड़ने की जरूरत है

एक पुरानी कहावत है कि एकता में बल होता है। जी हाँ इसमें कोई दो राय नहीं है। वैसे आज भारत देश की बात की जाए तो इस समय भी यू पी ए सरकार भी इसी मंत्र पर राज कर रही है। यदि अन्य राजनैतिक पार्टियों का गठबंधन न होता तो क्या यू पी ए सरकार को देश की बागडोर संभालने का मौका मिल पाता। परंतु वोटो की राजनीति ने कांग्रेस के नेता व स्वार्थ सिद्धि में माहिर इन शातिरों को देश के विभिन्न राज्यों को छोटे छोटे टुकड़ों में बांटने में कोई भी झिझक नहीं होती है। फिर चाहे उत्तर प्रदेश से पूर्वाञ्चल, पश्चिम बंगाल से गोर्खालेंड, बुंदेलखण्ड, महाराष्ट्र से विदर्भ, असम से बोडोलेंड या हाल ही में आंध्र प्रदेश से तेलंगाना बनाने की योजना। ये देश को कमजोर व खोखला करने में सहायक साबित होंगे। अरे जनाब राज्यों के बँटवारे के बाद नए व छोटे राज्यों की स्थापना के बाद कितने राज्यों का वास्तविक विकास हुआ है यह किसी से छुपा नहीं है।

अस्सी के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने पंजाब ही खालिस्तान की स्थापना को विफल करने में अपनी जीवन लीला की ही कुर्बानी दे डाली। तत्कालीन समय में, खलिस्तान को लेकर हिन्दू व सिख समाज में काफी मतभेद भी हुए तथा खूब कत्ले आम भी हुए। जो आज तक हमारे देश के इतिहास में सांप्रदायिक एकता के कलंक के रूप में मात्र अभिशाप ही साबित हुए हैं। आज वही कांग्रेस पार्टी न जाने क्यों राजनैतिक हितों को प्रमुखता देकर देश की एकता को चुनौती दे रहें हैं। देश को एकजुट करने के लिए न कोई नेता न कोई अभिनेता प्रयास कर रहा है तो देश का उद्धार कैसे होगा? यह एक अहम प्रश्न है इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा।

सम्राट अशोक के विशाल साम्राज्य की चर्चा पूरे विश्व के इतिहास में एक उम्दा मिसाल के तौर पर आज भी सराही जाती है। तो क्या उसी देश की माटी में जन्मे इन नीतिनिर्धारकों को शर्म नहीं आती की वे अपने निजी हितों को प्राथमिकता देकर देश के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं।

राज्यों की तो बात ही छोड़िए हिंदुस्तान व पाकिस्तान बँटवारे पर विचार किया जाए तो पूरे विश्व को पता है कि 1947 में विभाजन के बाद से पाकिस्तान ने कितनी तरक्की की है। जबकि दूसरी तरफ पूर्वी व पश्चिमी जर्मनी, उत्तरी व दक्षिणी कोरिया के समागम से राष्ट्रों को पुनः विकसित होने में मजबूती मिली है। हमें उक्त उदाहरणों पर गौर करना चाहिए और कुछ ठोस कदम उठाकर देश को तोड़ने का नहीं बल्कि जोड़ने का प्रयास करना होगा। उस स्थिति में ही हम अपने आप को साबित कर पाएंगे। और गर्व से कह पाएंगे

“सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा
हम बुलबुले है इसकी ये गुलसिता हमारा”

सुरेन्द्र सिंह डोगरा
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