प्रकृति हमें खूब सिखाती है जीवन में आगे बढ्ने का नित नए पाठ पढ़ाती है

सुरेंदर  सिंह डोगरा 

जीवन में हमें सभी तरह के लोग मिलते हैं। सबकी अपनी सोच, मानसिकता व कार्यशैली होती है। परंतु हमें हर लम्हे व प्रतेयक व्यक्ति से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है. हमें प्रति दिन सभी घटनाओं को ऐतिहासिक मानकर, पूरी मेहनत व लगन से अपने दैनिक कार्यों को निपटना चाहिए। यदि हमें कहीं भी लगे कि जो व्यक्ति लोगो की राय में या वैसे भी हमारे साथ दिखते हैं वे जरूरी नहीं हमारी कामयाबी में सहायक भी हो।और उनकी प्रेरणा हमारे साथ है तो बहुत अच्छी बात है। परंतु यदि लगे की यही शुभ चिंतक या साथी हमारी सफलता में रुकावट या निष्क्रिय साबित हो रहे हैं तो ऐसे लोगों से किनारा कर लेने में ही भलाई है। जीवन में शोध कार्य ज़िंदगी भर चलता रहता है यह हमें यही सिखाता है कि आप सज्जन, कर्मशील, प्रेरक, अच्छे व सहयोगी लोगों के संग समय बिताना सिंखे व उन्हे अपने जीवन में अहम इज्जत प्रदान करें। आप स्वयं ही नित नई सफलताओं की सीढ़ियाँ चढ़ते चले जाओगे और जो लोग आपका अपमान, आलोचना व हीन भावना से देखते रहे होंगे एक ना एक दिन आपकी तपस्या व परिश्रम से प्राप्त शोहरत के आगे नतमस्तक हो जाएंगे।

क्या कभी सूर्य को चमकने से कोई रोक पाया है। आँधी, तूफान व बारिश क्षण भर के लिए बेशक बाधक रही हो।यह भी सत्य है कि दिन में चमकता है रात के अंधेर में सूरज नहीं चमकता। सूर्य से हमें दिन भर क्रियाशील रहने की प्रेरणा लेनी चाहिए तभी हम ज़िंदगी में सूर्य की ही भांति चमक सकते है।

रात को चंद्रमा को चमकना है सौंदर्य के प्रतीक चाँद की चाँदनी की अनुभूति कर रचनशील होना चाहिए जीवन में इसका अपना अलग ही वजूद है।

आँधी व वर्षा ऋतु भी हमें जीवन की अनेक रुकावटों को झेलने का सबक सिखाती है।

प्रकर्ति हमें खूब सिखाती है जीवन में आगे बढ्ने का नित नए पाठ पढ़ाती है।

लोगों को सकारात्मक तरीके से पेश आओ तथा अपने परिवार, सहकर्मियों, दोस्तों यहाँ तक अनजानों से भी सकारात्मक ऊर्जा फैलाने का प्रयास करिए। देखिये किस तरह से आपके बारे में गलत भ्रांति रखने वाले भी आपके घनिष्ठ मित्र बन जाएंगे। और आप पूरे जगत में सबसे धनवान व्यक्ति बन जाएंगे। परंतु धन से नहीं लेकिन आत्मा से। यही जीवन का सार है।

कृपया हिन्दी फिल्मी गीत पर गौर फरमाए।

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया
बर्बदियों का शोक मनाना फिजूल था
बर्बदियों का जश्न मनाता चला गया
हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला.गया
जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया
उसी को मुकद्दर समझ लिया
जो खो गया मैं उस को भूलता चला गया
हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया
गम और खुशी में फर्क ना महसूस हो जहां
मैं दिल को उस मुकाम पर लता चला गया
हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया .

Leave a Reply