गांधीजी की प्रासंगिकता

प्रो.  उर्मिला परवाल 

उज्जैन (म.प्र.)
urmiporwal@gmail.com


2 अक्टूबर हर साल आता है और चला जाता है, प्रतिवर्ष इस दिन राष्ट्रपिता को याद करने की रस्म भी अदा की जाती है। लेकिन वर्तमान में गांधी जयंती मनाए जाने का अंदाज बदल गया है, पहले गांधी जयंती पर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर चर्चा की जाती थी परन्तु अब गांधीजी की प्रासंगिकता चर्चा का विषय बन गयी है। गांधीजी क्या थे यह तो सर्वविदित है और जहां तक उनकी प्रासंगिकता का प्रश्न है- तो  यह अपने आप में एक सवाल भी है और जवाब भी। हालहि में एक सर्वेक्षण आया कि गांधी नहीं बिल गेट्स हैं युवाओं के आदर्श इसी बीच एक और सर्वेक्षण आया जिसमें यह बताया गया कि देश के 76 प्रतिशत युवा अपना नायक महात्मा गांधी को मानते है।

इस विषय में तो  मेरा मानना यह है कि महात्मा गांधी कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते क्योंकि उन्होंने  ताउम्र जो मुद्दे उठाए और जिन सिद्दांतों को  प्रसारित किया, उनकी जरूरत आज भी उतनी ही है जितनी पहले थी, वर्तमान में उनके विचारों पर हो रहें हमलों से ये जरूर माना जाने लगा है कि उनकें विचार अप्रासंगिक हो रहें है। तमाम सर्वेक्षण भी गला फाड़कर यह उद्दघोशणा कर रहें है कि गांधी के भारत में अब गांधीवाद प्रांसगिक नहीं रह गया, कहीं-कहीं यह सच भी प्रतीत होता है, क्योंकि आदर्श की बात जिस कालखण्ड में कटु लगे, उसमें गांधी प्रासंगिक हो भी कैसे सकते है। लेकिन यहीं सर्वेक्षण यह भी बताते है कि गांधी दिमाग नहीं, दिल में अभी भी बसते है। आज भी भारतीय मन कहीं न कहीं यह विश्वास करता है कि अंत में जीत अच्छाई की ही होती है। वह मानता है कि वास्तविक सुख सच्चा-ईमानदार-संत¨व्यक्ति ही पा सकता है। यही तो गांधीवाद है, जो हर हिन्दुस्तानी के मन में है। हां यह बात जरूर है कि क¨ई इसे गांधीवाद कहता है तो  किसी के लिए यह गांधीगिरी है। अगर कोई एक दिन का सुल्तान बनना चाहता है तो भले ही वह गांधीजी के सिद्धान्त की अव्हेलना कर के अपना काम चला सकता है लेकिन यदि इतिहास में अपना नाम दर्ज कराना है तो गांधीजी के सिद्धान्तों  पर चलना अनिवार्य है। दरअसल सत्य, अहिंसा समेत गांधीजी के तमाम सिद्धान्त भारतीय संस्कारों में रचे-बसे हैं। भले ही ये धुंधला रहें हैं, पर इनकी जड़े अभी तक सूखी नहीं हैं। जिस प्रकार शरीर मरता है आत्मा सदैव जीवित रहती है ठीक उसी प्रकार विचारों  एवं सिद्धांततों के रूप में गांधीजी हमेशा जीवित रहेंगे। गांधीजी महात्मा थे और कहते हैं-महात्मा अमर होते है कभी मरते नहीं। ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ के मुन्ना की ‘गांधीगीरी’ की चर्चा आज भी होती है उस पर विराम अब भी नहीं लगा है। खबरें आती रहती है कि अमुक जगह पर सफाई के लिए या भ्रष्टओ के खिलाफ, जहा देखो तहा गांधीगीरी हो रही है। इस गांधीगीरी को  देखकर यह बात पूरे जोर शोर से कही जा सकती है कि जब समस्याओ के समाधान के लिए सभी विकल्प आजमाने के बावजूद गुत्थी नहीं सुलझती है तब गांधीजी का आभामंडल लोगों को आकर्षित करता है।

आज प्रत्येक क्षेत्र में यह महसूस किया जा रहा है। कि गांधीजी के बताए रास्तें पर चलतें तो जितनी भी कठिनाईयाँ है उन सब का हल कर लिया जाता। गांधीजी ने पराधीन भारत के लिए भी कुछ नीतियाँ तय की थी और स्वाधीन भारत के लिए भी, उनकी नीतियों ने आजादी तो दिला दी, लेकिन अब जरूरी हैं कि आजादी के बाद उनके द्वारा सुझाए रास्तों पर चला जाए। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति का फिलिस्तीन को हिंसा त्याग कर गांधीजी के द्वारा बताए रास्ते पर चलने की सलाह देना इस बात क¨ प्रमाणित करता है कि मानव जाति के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का समाधान गांधीजी के दर्शन में ही निहित है। इसका बोध जितनी जल्दी पूरे संसार को हो जाए, मानवता का उतना ही भला हो सकता है। गांधीजी ने बार-बार कहा कि हिंसा चाहे किसी भी तरह की क्यों न हो, पहले वह दिमाग में जन्म लेती है फिर विचारों में तब्दील होती है। उसका प्रदर्शन तो सबसे बाद की स्थिति है, लेकिन हम प्रदर्शन को ही हिंसा मानने कि भूल करते है, इसलिए ऐसा लगता है कि विश्वव्यापी आतंकवाद की समस्या का समाधान गांधीगीरी से नहीं हो सकता। जबकि ऐसा नहीं है। मानाकि अहिंसा का रास्ता काँटों भरा जरूर है, और उस रास्तें पर चलने पर परिणाम भी देर से दिखाई देते हैं, लेकिन जो परिणाम आते हैं वे ठोस होते है, वे उथले नहीं हो सकते, जैसे एक प्रकार की हिंसा को दबाने के लिए दूसरे प्रकार की हिंसा करने के बाद मिलते है। जरा सोचिये -हिंसा को प्रतिहिंसा से दबाया जाएगा तो निश्चित है कि हिंसक गतिविधियों में लिप्त कोई भी व्यक्ति या समुदाय प्रतिहिंसा के भय से चुप तो हो जाएगा, लेकिन मौका मिलते ही वह फिर हिंसक हो उठेगा। आजकल यहीं तो हो रहा है। हिंसा-प्रतिहिंसा के खेल में न तो हिंसक निर्भय हो पाते है और न प्रतिहिंसक। ऐसे भय के वातावरण में गांधीजी के बताए मार्ग पर चलकर ही देश की समस्त समस्याओ का समाधान संभव है क्योंकि उनका मार्ग विकल्पहीन है। गांधीजी की क्रांतिकारी और नैतिक श्रेष्ठता इस अभूतपूर्व तथ्य में निहित है कि उन्होंने जीवनभर अहिंसा के सिद्धांत का पालन करके अपने विशाल और विविधतापूर्ण देश को आजाद कराया। गांधीजी को अहिंसा का पुजारी और भारत के राष्ट्रपिता  के रूप में संब¨धित किया जाना सर्वथा उचित है। और इस बात से तो सभी भलीभाँति परिचित हैं कि जिन चीजों से मिलकर हमारा भारत बना है, उनमें महात्मा गांधी भी शामिल है। अगर मैं यह कहों कि-महात्मा गांधी के बिना भारत की कल्पना ही नहीं की जा सकती-तो अतिश्योक्ति नहीं है। गांधीजी के जन्मदिवस पर उन्हें याद करके उनके सत्य, अहिंसा और सौहार्द्य के संदेश पर हमें फिर से विचार करना होगा साथ ही यह स्वीकारना होगा कि उनके द्वारा बताए गए रास्ते को अपनाकर ही असत्य और दायित्वहीनता पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

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