ॐ माँ !!!

या देवी सर्वभूतेषु
या देवी सर्वभूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: || या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥ या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

माँ को पुकारना
भावना पूर्ण भाव से माँ को पुकारना ही उनकी साधना है , जो जितनी भावना से माँ शब्द का उच्चारण भर करता है उसे उसकी शक्ति का अनुभव अवश्य होता है ।

नवरात्री
वर्ष में यू तो चार नवरात्री आती है दो गुप्त नवरात्री है और दो प्रत्यक्ष । अश्विन व चैत्र मास की नवरात्री अधिक प्रचलित है ।



माँ का उच्चारण
ॐ आदि नाद है जो अ उ म अक्षर से बनता है । माँ आदि स्वर है जो म उ अ अक्षर से बनता है । नाद बिना प्रयास के उत्पन्न होता है । माँ का उच्चारण करने के लिए अत्यंत अल्प प्रयास की जरुरत होती है ।

सुर
संगीत के सातों स्वर का उच्चारण अलग अलग प्राणियों के द्वारा जैसे रे का उच्चारण ऋषभ अर्थात बैल से होता है । पंचम सुर प का उच्चारण कोयल से होता है तो माँ का उच्चारण गौ से होता है माँ……….
गौ माता
जिस प्रकार गौ माता संसार के सभी प्राणियों की माँ है इसलिए वह सभी प्राणियों को बिना किसी भेद भाव सभी जाति , भाषा , धर्म , पापी , धर्मात्मा इत्यादि सभी को अपना मधुर दूध पिला कर पोषण करती है । यहाँ तक की अपना वध करने वाले को भी क्षमा कर मीठा दूध, दही, घी इत्यादि पिलाकर पुष्ट करती है, यही उसके मातृत्व की पराकाष्ठा है। अतः हम सभी माँ की अराधना करके गौ माता की सेवा तथा पालन का व्रत लें , जिससे हमारे देश में पुष्टि, तुष्टि शांति, करुणा , दया, विद्या तथा सर्वधर्म सम्भाव एवं विश्व बंधुत्व की भावना को हम वरदान के रूप में प्राप्त करे ।


प्रथमं —– शैलपुत्री
पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण शैलपुत्री कहलाती है । नदियों , पहाड़ों इत्यादि का प्रकृति के सामंजस्य में बहुत बड़ा योगदान है । हमारी नदियाँ तो प्रदूषित हो चुकी हैं इसके साथ पहाड़ भी विक्षुब्ध हो गए हैं । इनका परिणाम केदारनाथ और बद्रीनाथ की त्रासदी के रूप में सामने है । हम सभी प्रथम दिन शैलपुत्री की पूजा करते हुए पहाड़ों की शुद्धता का भी संकल्प लें ।

द्वितीयं ——– ब्रह्मचारिणी
तप , त्याग , वैराग , सदाचार और संयम का आचरण करने वाली देवी ही ब्रह्मचारिणी कहलाती है । अतः भोग विलास तथा असंयम का त्याग कर हम ब्रह्मचारिणी देवी की सच्ची आराधना कर सकते हैं ।


तृतीयं ———- चन्द्रघंटेती
इनके मस्तक पर घन्टे के आकर का अर्ध चन्द्र है , इसी कारण इन्हें चन्द्रघंटा देवी कहा जाता है । इनका वाहन सिंह है अतः इनका उपासक सिंह की तरह ही पराक्रमी हो जाता है । परन्तु देवी का स्वरुप अत्यंत सौम्य व शांत है अतः हम सभी साधकों में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता का भी विकास होता है । तभी हम सांसारिक कष्टों से विमुख होकर परम-पद पा सकते हैं ।

चतुर्थं ———–कूष्माण्डा
कूष्मांड कहते हैं कुम्हड़े को । इसका आकार ब्रह्माण्ड की तरह होता है अतः ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति देवी की मंद मुस्कान से ही होती है । ब्रह्माण्ड की रक्षा ही हमारी रक्षा है । आजकल हमारे पास ऐसे विनाश कारी अस्त्रों का भण्डार हो गया है , की पूरे विश्व का विनाश पल भर में ही हो सकता है । हम सभी को ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए उठ खड़े होने का सन्देश ही कूष्माण्डा देवी देती हैं ।
पंचमं ————स्कंदमातेती
कार्तिक की माँ होने के कारण ही इनका नाम स्कंदमाता पड़ा है । स्कन्द प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे , तथा तारकासुर का विनाश कर सम्पूर्ण दनावसत्ता को विस्थापित कर देव सत्ता अर्थात करुणा , दया, समता , ज्ञान इत्यादि गुणों को स्थापित किया था । इनकी उपासना से परम शांति और सुख की उपलब्धि होती है ।

षष्टम ————— कात्यायनी
महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में जन्म के कारण इन्हें कात्यायनी कहा जाता है । कात्यायनी देवी ने दशमी को महिषासुर का वध किया था । इनकी आराधना से ही गोपियों ने भगवान् कृष्ण को पाया था । आजकल सब जगह रोग, शोक , संताप, भ्रष्टाचार भयंकर रूपी महिषासुर का साम्राज्य हो गया है । अतः माँ कात्यायनी से प्रार्थना है कि वे इस महिषासुर का विनाश कर हमें कृत कृत करे ।
सप्तमं ————-कालरात्रि
माँ कालरात्रि का स्वरुप अत्यंत भयानक है । परन्तु ये सदेव शुभ फल देने वाली हैं । अतः इनका एक नाम शुभमकरी भी है । इनके उपासक को अग्नि , जल, जंतु शत्रु और रात्रि का भय कभी नहीं होता है । अतः भव -भयहारणी मान कालरात्रि हमरे भय को भी हर लेती हैं ।
अष्टमं ———————महागौरी
इनका रूप गौर वर्ण होने के कारण महागौरी कहा जाता है । इनकी उपासना से भक्तों के सभी कल्मष धुल जाते हैं । तथा भविष्य में पाप , संताप , देन्य , दुःख उसके पास कभी नहीं आते हैं । अतः माँ से प्रार्थना है की हमारे जीवन में दुःख देन्यता का कभी आगमन नहीं हो ।
नवं ————– सिद्धिदात्री
नव दुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम है । अन्य आठ दुर्गाओं की आराधना शास्त्रीय विधि अनुसार करते हुए भक्त माँ सिद्धिदात्री की उपासना के लिए अग्रसर होते हैं । माँ भक्तों की सभी कामनाओं को पूर्ण करते हुए भक्तों के ह्रदय में कामनाओं को निःशेष कर देती है । हम सभी मिल कर माँ से प्रार्थना करते हुए परम शांति दायक अमृत तत्व की प्राप्ति कर अपने को धन्य बनाएं ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
पुत्रो कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि माता कुमाता न भवति | 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
प्रस्तुति  – मधुरिता 

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