धारा 377 का मूल उद्देश्य बच्चो या नाबालिगो के साथ अप्राकृतिक यौन सम्बन्धो को रोकना था ?

रविन्द्र सिंह डोगरा

भारत के सर्वोच्च न्यायलय के न्यायमूर्ति श्री जीएस सिंघवी ने 11 -12 -2013 को अपनी सेवानिवृति से पूर्व एक अभूतपूर्व फैसले में धारा 377 को वैघ करार देते हुए समलैंगिग सम्बन्धो को भारत में अवैध ठहराया और अपराध कि श्रेणी में बरक़रार रखा ! जिस से भारत में एक नयी बहस शुरू हो गयी है बुद्धिजीवियों , राजनेताओ, मानवाधिकार संगठनो, समलैंगिको और समलैगिकता का विरोध और उनका पक्ष लेने वालों के बीच में ! परन्तु विषय का वास्तविक मर्म या ज्ञान न कोई समझ रहा है और ना कोई समझना चाहता है और ना कोई समझाना चाहता है बस मामले को तूल दिया जा रहा है ! आइये आपको दोनों पक्षों कि दलीलों से होनेवाले नुकसान और उनका तर्क और उस पर मेरे अपने विचार बताता हूँ !

मानवाधिकार संगठनो , समलैंगिको का कहना है कि जब एक ही लिंग के दो व्यक्ति (महिला या पुरुष ) अपनी मर्ज़ी से आपस में बिना किसी जोर जबर्दस्ती के बंद कमरे में बिना किसी को परेशान किये यौन सम्बन्ध अपनी इच्छा पूर्ति और आनंद केलिए बना रहे है तो इसमें क्या हर्ज़ है ? उनकी आज़ादी और उनके व्यक्तिगत जीवन में दखल देने का किसी को भी कोई हक़ नहीं है ! बात बिलकुल सही भी है ! मेरा भी यही मानना है परन्तु न्यायपालिका के निर्णय या आदेश पर मेरी और से कोई प्रश्न चिन्ह नहीं है हाँ कुछ चीज़े हैं जो संदेह के दायरे में आती हैं जैसे कि बलात्कार के अनेको अनेक अपराधो के बाद भी और अपराध साबित होने के बाद भी दोषी को फांसी देने कि मांग पर अभी तक सर्वोच्च न्यायलय ने कोई निर्णय या विधायिका ने कोई निर्णय नहीं लिया क्यों? जब यौन शोषण के अपराध में जांच दल को साक्ष्य जुटाने में तकलीफ होती है तो किसी समलैंगिक कि जांच या ये कैसे साबित किया जायेगा कि वो समलैंगिक है ? और साबित कर भी दिया तो उनके यौन सम्बन्ध को कैसे साबित किया जायेगा ? क्योंकि यहाँ एक बात आप सब को बता देता हूँ , कि एक महिला समलैंगिक अपनी साथी महिला के साथ यौन सम्बन्ध बना ही नहीं सकती क्योंकि तकनिकी रूप से और शारीरिक रचना के अनुसार महिला के पास सम्बन्ध स्थापित करने का साधन नहीं है, यानि के एक महिला, पुरुषों कि तरहं दूसरी महिला के साथ सम्भोग कर ही नहीं सकती ! लेकिन दूसरी तरफ एक पुरुष अपने समलैंगिक  पुरुष  मित्र के साथ महिला के जैसे सम्भोग कर सकता है क्योंकि तकनिकी रूप से दोनों सम्भोग के लिए उपयुक्त हैं ! अब सवाल ये उठता है कि क्या फिर यह कानून सिर्फ पुरुषों पर लागू होना चाहिए ?  याद रहे यदि इस तरहं से न्याय प्रक्रिया चली तो आपसी सहमति से बालिगों द्वारा बनाये गए हर वो सम्बन्ध जिसमें यौन सम्बन्ध् स्थापित किये जाते हों, अपने आप ही अपराध कि श्रेणी में आ जायेंगे तब क्या होगा ? भविष्य में हो सकता है कि पुरुषों व महिलाओं द्वारा अपने हाथों से किये गए स्वयं को स्वाखलित ( हस्तमैथुन ) को भी अपराध माना जाये ? क्योंकि क्रिया – कलाप तो एक ही है !

ये जान लेना बहुत जरुरी है कि , धारा 377 ब्रिटिश शासन के दौरान बनायीं गयी वह धारा है , जिसका मूल उद्देश्य बच्चो या नाबालिगो के साथ अप्राकृतिक यौन सम्बन्धो को रोकना और बाल अपराध को रोकना तथा बलात्कार जैसे कृत्यों पर अंकुश लगाना था ? अगर ऐसा नहीं होता तो उसी ब्रिटेन में समलैगिकता को मान्यता नहीं मिलती और आप सब कि जानकारी के लिए बता दू कि ब्रिटेन का पहला समलैंगिक विवाह 29 मार्च 2014 होने जा रहा है !

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