हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की हिडिम्बा देवी ने बलि लेने से किया इनकार


सराज क्षेत्र के चिऊणी में देवी ने स्वयं तोड़ी सदियों पुरानी परम्परा

अशोक कुमार निर्भय

हिडिम्बा देवी ने अपने मंदिर की स्थापना के वार्षिक आयोजन पर बलि लेने से इनकार कर दिया इतना ही नहीं देवी ने स्वयं आगे बढ़कर अपने हरियानों को भविष्य में मंदिर परिसर में बलि प्रथा पर पूर्णतया रोक लगाने के आदेश भी दिए। देवी हिडिम्बा का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हाईकोर्ट के फैसले के बाद देव समाज में बलि प्रथा को लेकर बहस छिड़ी हुई है। एक ओर हाईकोर्ट के फैसले का विरोध करने वाले इसे आस्था पर हस्तक्षेप कह कर बलि प्रथा का समर्थन कर रहे हैं तो दूसरी ओर हिडिम्बा द्वारा आगे बढ़कर बलि लेने से इनकार करना अपने आप में सराहनीय है।

यह मामला हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के सराज विकास खंड की अत्यंत दुर्गम पंचायत चिऊ णी का है। मंदिर परिसर में वार्षिक स्थापना समारोह का आयोजन रखा गया था। हाईकोर्ट के आदेश के बाद देवी के हरियान दुविधा थे कि मंदिर परिसर में बलि दी जाए अथवा नहीं हालांकि देवलुओं ने इसके लिए पूर्ण तैयारियां कर रखी थी। देवी ने देवलुओं के असमंजस को समझते हुए बलि लेने से इनकार कर दिया।

हिडिम्बा मंदिर कमेटी के सचिव रामचंद्र ने बताया कि करीब ढाई सौ साल पुराने पौराणिक मंदिर के जीर्णोद्धार के बाद यहां वर्षगांठ समारोह का आयोजन किया गया था। प्राचीन परंपरा के अनुसार मंदिर के वार्षिक समारोह में पांच बकरों/मेढ़ों की बलि दी जानी थी, लेकिन देवी हिडिम्बा के आशिर्वाद से बलि देने की नौबत ही नहीं आई। लोगों ने भी देवी के आदेश का माना और मंदिर में कोई बलि नहीं चढ़ाई। उन्होंने बताया कि देवी ने भविष्य में मंदिर परिसर में बलि प्रथा पर पूरी तरह से रोक लगा दी है।

गौरतलब है कि चिऊणी पंचायत के सराहु में स्थित देवी हिडिंबा मंदिर के प्रतिष्ठा समारोह के दौरान मंदिर परिसर में 31 बलियां दी गई थी जबकि पूरी क्षेत्र में लगभग 150 बकरों की बलि चढ़ी थी। देवी के कुल पुरोहित शेर सिंह उर्फ नागणू ने बताया कि गत वर्ष मंदिर के शुद्धीकरण को 27 बकरों के अलावा एक सूअर, एक मछली, एक मशैकड़ा (कैकड़ा) और एक पेठे की बलि दी गई लेकिन इस बार देवी ने किसी भी प्रकार की बलि लेने से इनकार कर दिया। मंदिर में स्थापना वर्षगांठ की समस्त कार्रवाई नारियल काटकर पूरी गई।


मंदिर का इतिहास
देवी हडिंबा सराहु में सदियों से बिराजमान है। मंदिर के बारे में सटीक जानकारी नहीं है कि इसकी स्थापना कब हुई और किसने की। पुराना मंदिर पहाड़ी शैली का था जिसे लगभग 1855 ईस्वी में झगडू राम मिस्त्री ने बनाया था। लोक मान्यता है कि देवी हिडिंबा ढु़ंगरी मनाली से लेकर थाची-पंजाई होते हुए यहां पर ठहरी और आज भी यहां पिंडी रूप में विद्यमान है। एक अन्य जनश्रुति के अनुसार 17वी सदी के आसपास यहां पर ढु़गरी मनाली से एक कुम्हार आया था। वह अपने किलटे में ढुंगरी से हिडिंबा देवी का मूर्ति साथ लाया था। वह यहां की चिकनी मिट्टी देखकर प्रभावित हुआ और यहीं पर मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करने लगा। कुम्हार ने सराहु नामक स्थान में हहडिंबा को स्थापित किया। देवी के आशिर्वाद से कुम्हार के घड़े और बर्तन इतने मजबूत होते थे कि वह नहीं टूटते थे। उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। कुछ समय बाद कुम्हार ने देखा कि कोई भी उसके घड़े और बर्तन खरीदने नहीं आ रहा। तो उसने निर्णय किया कि वह इसके बारे में पता करेगा। उसने लोगों से उसके पास दोबारा बर्तन खरीदने के लिए न आने का कारण पूछा तो लोगों ने बताया कि इसकी जरुरत ही नहीं पड़ी क्योंकि उसके बर्तन इतने मजबूत हैं कि नए खरीदने की आवश्यकता ही नहीं है। यह सुनकर कुम्हार का दिमाग चकराया और सोचा कि अगर ऐसा रहा तो मेरा काम तो चौपट हो जाएगा और वह सराहु छोड़कर चला गया। कुम्हार के जाने के बाद क्षेत्र में देवी की शक्ति से कई अलौकिक घटनाएं होने लगी और करीब डेढ़ सौ साल बाद यहां मंदिर बनाया गया। तब से लेकर आज तक स्थानीय लोग हिडिम्बा को कुल देवी के रूप में पूजते आए हैं। देवी के कारदार रोशन लाल ने बताया कि चिऊ णी में हिडिंबा का स्वर्ण मुख वाला भव्य रथ है। मंदिर के अलावा क्षेत्र के घाट और चेत गांव में देवी की दो कोठियां हैं रथ बारी-बारी से इन कोठियों में रहता है। जुलाई माह कि अंतिम सप्ताह सराहु स्थित हिडिम्बा माता के मंदिर परिसर में एक मेले का आयोजन होता है। मेले में देवी स्थानीय कुल देवता शैटीनाग के साथ शोभायात्रा में भाग लेते ही हैं। मेले में हिडिम्बा में आस्था रखने वाले लोग अपनी मन्नतें पूरी होने पर पहुंचते हैं। इसके अलावा मेले में अन्य स्थानीय देवता भी शोभा बढ़ाते हैं।

कैसे पहुंचें मंदिर तक

हिडिम्बा देवी का यह मंदिर समुद्रतल से लगभग 25 सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। जिला मुख्यालय मंडी से 90 किलोमीटर दूर इस मंदिर तक पहुंचने के लिए चिऊणी तक बस योग्य सड़क है। मंडी से चिऊ णी तक सीधी बस सेवा है। इसके अलावा चिऊणी तक छोटे वाहनों से भी पहुंचा जा सकता है। चिऊणी से सराहु स्थित के मंदिर तक पहुंचने के लिए 700 मीटर का ट्रैक है। मंदिर में परिसर में श्रद्धालुओं को ठहरने के लिए कोई व्यवस्था नहीं हैं स्थानीय लोग हिडिंबा के दर्शन को आने वाले श्रद्धालुओं को अपना अतिथि मानकर अपने घर ले जाते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से देवी प्रसन्न होती है।

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