सनातन सखा (उपनिषद के आधार पर)

जीवात्मा तथा परमात्मा के बीच बहुत निकट का संबंध है । यों तो जीवात्मा परमात्मा का ही अंश है – दोनों अनादि है पर जीवात्मा परमात्मा से अनभिज्ञ रहता है कभी खुश होता है तो कभी दुखी । दूसरी तरफ परमात्मा अपने आप में मग्न रहता है- आनन्द से परिपूर्ण रहता है-सर्वदा एक रस रहता है तथा शान्त रहता है परमात्मा जीवात्मा को भी देखता है परन्तु जीवात्मा भोगों में मग्न होने के कारण परमात्मा के साथ रहते हुये भी उन्हें नही देख पाता ।

परमात्मा —-    जीवात्मा
इसे ही एक रूपक के द्वारा श्वेताश्वतरोपनिषद में इस प्रकार बताया गया है:

‘‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन यो अभिचाकशीति ।।’’

सयुजा = सदा साथ रहने वाले, (तथा) सखाया = परस्पर सख्यभाव रखने वाले, द्वा = दो, सुपर्णा = पक्षी (जीवात्मा तथा परमात्मा), समानम् = एक ही, वृक्षम = वृक्ष (शरीर) का आश्रय लेकर रहते है, तयोः = उन दोंनो में से, अन्य = एक (जीवात्मा) तो, पिप्पलम् =उस वृक्ष के फलेां (कर्म फलों) को, स्वादु=स्वाद ले-लेकर, अत्ति = खाता है, अन्यः=किन्तु दूसरा (ईश्वर), अनश्नन् =उनका उपभोग न करता हुआ, अभिचाकषीति = केवल देखता रहता है ।

यह मनुष्य शरीर एक पीपल का वृक्ष है । आत्मा तथा परमात्मा ये दोनों सनातन सखा अर्थात् दो पक्षी हैं जो इस शरीर रूपी वृक्ष पर हृदय रूपी घोसलें में एक साथ निवास करते हैं । इन दोनो में से एक तो इस शरीर रूपी अश्वत्त्थ (पीपल) वृक्ष के फल को खाता है – कभी मीठा फल मिलने पर वह आनन्द से हर्षित होकर एक टहनी से दूसरी टहनी पर फुदकता रहता है । जीवात्मा(भोक्ता) तो कभी आनंद से हर्षित होकर नाच उठता है -मोर की तरह | कभी कड़वे फल मिलने पर वह दुःख से कराह उठता है । फिर सुख की खोज में इधर से उधर व्याकुल होकर भागता रहता है । भागते भागते वह कभी गिर पड़ता है लहुलुहान होकर अधमरा सा हो जाता है । कभी थक कर बैठ जाता है । बेसहारा बेचारा |

उसका सारा उत्साह, सारा आनन्द जाता रहता है । वह दुःखी होकर शान्त बैठ जाता है । परमात्मा की प्रार्थना करता है – “हे प्रभो ! मुझे इन दुःखों से मुक्ति दें । मेरे अपराधों को क्षमा करें । हे सखा! हे मेरे सुहृद! मेरे ऊपर कृपा करें । हे दीनबंधु! अबकी बार मोहे उबारो| मेरे सामान इस संसार में अन्य कोई दुखी नहीं है और आप के सामान दूसरा कोई दीनबंधु नहीं |मेरी एकमात्र शरण,मेरी गति, हे परमात्मन् ! तू ही है ,तू ही है |”

उसकी आंखों से परमात्मा के लिये पश्चात्ताप के आँसू टपक पड़ते हैं। 

तभी एकाएक उसकी दृष्टि चुपचाप बैठे हुये उस सनातन सखा अर्थात् परमात्मा पर पड़ती है जो इन फलों को खाता नहीं है वह केवल देखता रहता है । परमात्मा(द्रष्टा) अर्थात शरीर में प्राप्त हुए सुख-दुःखों को भोगता नहीं है।

जीवात्मा भी तब भोक्ता नहीं द्रष्टा बन जाता है – और फिर वह उसका मित्र अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा दो ही रह जाते है और वह सनातन सखा अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा परस्पर मित्रता का आनन्द लूटते हैं ।

जीवात्मा परमानंद परमात्मा हो जाता है पीपल के फल की सत्ता ही गायब हो जाती है । एक प्राण दो शरीर हो जाता है । पूर्णतया घुल जाता है ठीक वैसे ही जैसे नमक की गुडि़या समुद्र की गहराई नापने के लिए जाये और घुलकर समुद्र ही हो जाता है । उस ज्ञानी पुरुष के लिए जो समस्त जगत को ब्रह्ममय देखता है , फिर ध्यान करने न करने, बोलने न बोलने को कुछ भी नहीं रह जाता है |

तब रह जाता है केवल आनंद-ही-आनन्द—परमानंद सत्-चित्-आनन्द– शिवोहम्-शिवोहम्

– मधुरिता

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