कॉमेडी, इमोशन व मोशन – पीकू

चन्द्रकांत शर्मा 

कलाकार: अमिताभ बच्चन, दीपिका पादुकोण, इरफान खान, मौसमी चटर्जी, रघुवीर यादव, जीशु सेनगुप्ता
निर्माता: एन पी यादव, राॅनी लहरी, स्नेहा राजानी
निर्देशक: शुजीत सरकार
कहानी: जूही चतुर्वेदी
संगीत: अनुपम राॅय

पीकू के लिए डायरेक्टर शुजीत सरकार व स्क्रिप्ट राइटर जूही चतुर्वेदी की तारीफ करनी होगी कि एक लम्बे अर्से बाद ऐसी फिल्म का निर्माण हुआ, जोकि शुरू से आखिरी तक आपको बांधने का दम रखती है। शुजीत सरकार इससे पहले ‘विक्की डोनर’ व ‘मद्रास कैफे’ जैसी फिल्में बना चुके हैं। पीकू एक ऐसी जर्नी है, जिस पर चलने के बाद आपका दिल करेगा कि यह खत्म ही न हो। आमतौर पर फिल्मों में यही दिखाया जाता है कि लड़का ही अपने मां-बाप के बुढ़ापे की सीढ़ी होता है परन्तु इस फिल्म में यह दिखाया गया है कि किस तरह से एक बेटी अपने 70 वर्षीय बूढ़े बाप का सहारा बनती है और इसके लिए वो शादी भी नहीं करती।

कहानी: फिल्म की कहानी शुरू होती है पीकू (दीपिका पादुकोण) से, जोकि अपने 70 वर्षीय पिता भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) के साथ दिल्ली के चितरंजन पार्क में रहती है। वैसे भास्कर बनर्जी शारीरिक रूप से बिल्कुल स्वस्थ हैं परन्तु उनका पेट हमेशा खराब रहता है और इसी वजह से वो हमेशा परेशान रहते हैं। बनर्जी परिवार में हर समय हरेक बात में एक ही टाॅपिक चलता है और वो है मोशन। चाहे बात कुछ भी हो, पर घूम-फिर कर मोशन पर ही आकर खत्म होती है। भास्कर बनर्जी बहुत ही चिढ़चिढ़े व बातूनी किस्म के इंसान हैं। बात किसी की भी हो, उन्हें उसमें जरूर टांग अड़ानी होती है इसलिए पीकू भी कई बार उनसे परेशान हो जाती है परन्तु पीकू अपने पापा का हमेशा बेहद ख्याल रखती है। यही वजह है कि पीकू ने अपने पापा की सेहत के चलते शादी भी नहीं की। इसी बीच पीकू व उनके पिता को अपने पुश्तैनी मकान को बेचने के लिए कलकत्ता जाना पड़ता है परन्तु पापा भास्कर की जिद है कि वो कलकत्ता सड़क के रास्ते ही जाएंगे यानि कि कार से। ट्रेवल कम्पनी का मालिक राणा चौधरी (इरफान खान) उन्हें अपनी गाड़ी में बिठाकर कलकत्ता के लिए निकल पड़ता है और यहीं आता है कहानी में टिवस्ट। अब देखना यह है कि गाड़ी से कलकत्ता तक का सफर कितना सुहाना रहता है? क्या पीकू शादी कर पाती है? क्या भास्कर बनर्जी का मोशन अपनी सही रफ्तार पकड़ पाता है? यह सब तो आपको पीकू ही बता सकती है।


अभिनयः अभिनय की बात करें तो पीकू यानि दीपिका पादुकोण ने एक बार फिर यह साबित कर दिखाया है कि उन्हें नम्बर वन अभिनेत्री का तमगा क्यों हासिल है। उन्होंने जीवंत अभिनय किया है। अमिताभ बच्चन ने बंगाली बुजुर्ग का किरदार बूखबी निभाया है। उनकी संवाद अदायगी बिल्कुल बंगाली है। इरफान खान अपने किरदार में बिल्कुल फिट है। अन्य कलाकारों में रघुवीर यादव व मौसमी चटर्जी ने भी अपने अभिनय के बूते पर छाप छोड़ी है।

संगीत: अनुपम राॅय का संगीत फिल्म की सिचुएशन के हिसाब से स्टीक है परन्तु फिल्म में कोई ऐसा गाना नहीं है जोकि आपको फिल्म देखने के बाद भी ध्यान रहे।

डायरेक्शन: शुजीत सरकार का डायरेक्शन बेमिसाल है। उन्होंने सभी किरदारों से बखूबी काम लिया है और साबित कर दिखाया है कि कलाकार चाहे कितने भी बड़े क्यों न हो परन्तु डायरेक्टर का बेस्ट होना जरूरी है क्योंकि वो ही उनसे बेस्ट निकलवा सकता है।

निष्कर्ष:
पीकू कोई मसाला फिल्म नहीं है। यह एक ऐसी जर्नी है, जिस पर आप अगर ध्यान से निकलेंगे तो बेहद सुखद अनुभव महसूस करेंगे। यह आपको हसांएगी भी, रूलाएगी भी। इस सप्ताह आप पूरी फैमिली के साथ पीकू से मिलने जा सकते हैं, यकीन मानिए, यह आपको निराश नहीं करेगी।

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