आदाब अर्ज़ है – रईस सिद्दीक़ी


रईस सिद्दीक़ी

रईस सिद्दीक़ी 27 दिसम्बर 1963 को लखनऊ में पैदा हुए। पहला एम.ए. हिंदी में और दूसरा एम. ए. उर्दू में किया। आप की शायरी में अनेक जगह हिंदी शब्द और संस्कृति नज़र आती है। आप साहित्य और मीडिया से सम्बद्ध है। आप की शायरी शब्दों और शैली के एतबार से सहज है। आप की ग़ज़लों से कुछ चुनींदा शेर पेश हैं।





हंसी हंसी में हर एक ग़म छुपाने आते हैं
हसीन शेर , हमें भी , सुनाने आते हैं

खार से दामन सजाना चाहिए
रंज में भी मुस्कुराना चाहिए
खार =शूल , काँटा , रंज= दुःख

ज़िन्दगी भर बस यही सोचा किये
अब किसी से दिल लगाना चाहिए

दो गाम मेरे साथ चले राहे इश्क़ में
मिलता नहीं है ऐसा कोई राज़दाँ मुझे
गाम = क़दम

जज़्बा औरों से जुदा होने का
फूल सैहरा में खिला सकता है

सच के बदले में तेरा शहेर ,रईस
तुझ को सूली पे चढ़ा सकता है

भर गए ज़ख्म मसीहाई के मरहम के बग़ैर
माँ ने की हैं मेरे जीनी की दुआयें शायद

दिल जिस का नहीं हर्फ़-ए – मोहब्बत से शनासा
वो ज़िन्दगी , वीरान मज़ारों की तरह है
शनासा = परिचित

कोई भी मंज़िल नहीं मुश्किल , बस इतनी शर्त है
अक़्ल में ठंडक, दिल में जोश रहना चाहिए

रईस, कौन सा आसेब है मकानों में
तमाम शहेर कहता है, जागते रहना

अब है हर चेहरा नुमाइश की तरह
हो चुकी है, इश्तिहारी ज़िन्दगी
इश्तिहार =विज्ञापन

पास रिश्तों का, न किरदार का
हो गयी है, कारोबारी- ज़िन्दगी

ये दुनिया तो सिमटती जारही है
मगर, इन्सां बिखरता जा रहा है

वो आदमी जो किसी का भला नहीं करता
इनायतें भी उसी पर ख़ुदा नहीं करता

विसाल , हिज्र , वफ़ा , फ़िक्र , दर्द ,मजबूरी
ज़रा सी उम्र में, कितने ज़माने आते हैं
विसाल =मिलन , हिज्र =जुदाई

ज़बान ही तो बनाती है फूल-काँटों को
हमारा लैह्जा ही लफ़्ज़ों को शूल करता है

जो नास्तिक था, उसे राम राम क्या करते
के बे-अदब का हम , एहतराम क्या करते

ये इख्तिलाफ की दीवार गिर नहीं सकती
मैं मौलवी को, वो साधू को साथ रखते हैं
इख्तिलाफ =मतभेद

चुकानी पड़ती है कीमत सफ़ेद-पोशी की
किसी का भी ऐब , यहाँ छुपा नहीं करता

अपनी मजबूरी है जो शहर में रहते हैं, रईस
घर बहुत मिलते हैं लेकिन दालान नहीं है कोई

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