संस्कार- संस्कृति और सभ्यता

प्रो. उर्मिला पोरवाल सेठिया 

बैंगलोर

भारत की अनेकानेक मान्यताओं एवं विषेशताओं में जो सर्वोपरी है वे है-संस्कार, संस्कृति और सभ्यता। सामान्यतया इन्हें पर्याय समझा जाता है लेकिन वास्तव में ये तीनों एक ही मार्ग (जीवन) के अलग-अलग पड़ाव है, जिनका अपना एक अलग महत्व और अस्तित्व है- मानव केवल शरीरमात्र नहीं हैं। वे तीन स्तरों पर जीते हैं और व्यवहार करते हैं – भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक, यही क्रमषः सभ्यता, संस्कृति और संस्कार कहलाते है।

संस्कार शब्द का अर्थ है -शुद्धिकरण अर्थात् मन, वाणी और शरीर का सुधार। दूसरे षब्दों में कहे तो संस्कार वे धार्मिक कृत्य कहलाते है जो किसी व्यक्ति को अपने समुदाय का पूर्ण रुप से योग्य सदस्य बनाने के उद्देश्य से उसके शरीर, मन और मस्तिष्क को पवित्र करने के लिए किए जाते हैे।

भारत में संस्कारों का मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व है, संस्कारों के द्वारा मनुष्य अपनी सहज प्रवृतियों का पूर्ण विकास करके अपना और समाज दोनों का कल्याण करता है। प्राचीन काल में तो, हमारा प्रत्येक कार्य संस्कार से ही आरम्भ होता था, या यूं कहे तो भी अतिष्योक्ति नहीं होगी कि जीवन ही संस्कारों पर आधारित था। माना जाता है कि हमारे मनीषियों ने हमें सुसंस्कृत तथा सामाजिक बनाने के लिये, अपने अथक प्रयासों और शोधों के बल पर ये संस्कार स्थापित किये थे, इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि ये संस्कार इस जीवन में ही मनुष्य को पवित्र नहीं करते बल्कि उसके पारलौकिक जीवन को भी पवित्र बनाते है।

संस्कार के दो रुप हैं – एक आंतरिक रुप और दूसरा बाह्य रुप। बाह्य रुप का नाम रीतिरिवाज है, जिनका पालन प्रत्येक सामाजिक वर्ग अपनी-अपनी नियमावली के माध्यम से करता है और ये रीतिरिवाज ही अपने नियमों से संस्कार के आंतरिक रुप की रक्षा करतें है। हालांकि जैसे-जैसे समय बदलता जा रहा है व्यस्तता बढती जा रही है कुछ संस्कार तो स्वतः इसी कारण विलुप्त हो गये, परन्तु हाल के कुछ वर्षो में देखने में आ रहा है कि आपाधापी की जिंदगी और अतिव्यस्तता के कारण धर्मावलम्बी अब इन मूल्यों में सुविधानुसार परिवर्तन भी करने लगे हैं, खैर परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है और समय के अनुसार बदलाव जरूरी भी है। मनुष्य स्वभावतः प्रगतिशील प्राणी है, वह बुद्धि के प्रयोग से अपने चारों ओर की प्राकृतिक परिस्थिति को निरन्तर सुधारता और उन्नत करता ही रहता है।

संस्कृति की बात करें तो उसका शब्दार्थ है – उत्तम या सुधरी हुई स्थिति। दूसरे षब्दों में कहे तो ऐसी प्रत्येक जीवन-पद्धति, रीति-रिवाज रहन-सहन आचार-विचार नवीन अनुसन्धान और आविष्कार, जिससे मनुष्य पशुओं और जंगलियों के दर्जे से ऊँचा उठता है तथा सभ्य बनता है। ओर सरल शब्दों मे हम कह सकते हैं कि-संस्कृति उस विधि का प्रतीक है जिसमें हम सोचते हैं और कार्य करते हैं। इसमें वे सभी चीजें भी षामिल हैं जो हमने एक समाज के सदस्य होने के नाते उत्तराधिकार में प्राप्त की हैं। एक सामाजिक वर्ग के सदस्य के रूप में मानवों की सभी उपलब्धियाँ संस्कृति कही जा सकती हैं। कला, संगीत, साहित्य, वास्तुविज्ञान, शिल्पकला, दर्शन, धर्म और विज्ञान सभी संस्कृति के पक्ष हैं, साथ ही संस्कृति में रीतिरिवाज, परम्पराएँ, पर्व, जीने के तरीके, और जीवन के विभिन्न पक्षों पर व्यक्ति विशेष का अपना दृष्टिकोण भी षामिल हैं।

अतः संस्कृति हमारे जीने और सोचने की विधि में हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति है। यह हमारे साहित्य में, धार्मिक कार्यों में, मनोरंजन और आनन्द प्राप्त करने के तरीकों में भी देखी जा सकती हैं।

संस्कृति के भी दो भिन्न उप-विभाग हैं- भौतिक और अभौतिक।

भौतिक संस्कृति उन विषयों से जुड़ी है जो हमारे जीवन के भौतिक पक्षों से सम्बंध रखतें हैं, जैसे हमारी वेशभूषा, भोजन, घरेलू सामान आदि। अभौतिक संस्कृति का सम्बध विचारों, आदर्शों, भावनाओं और विश्वासों से है। इस प्रकार संस्कृति मानवजनित पर्यावरण से सम्बन्धित है जिसमें सभी भौतिक और अभौतिक उत्पाद एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्रदान किये जाते हैं।

सामान्य अर्थ में अभौतिक संस्कृति को संस्कृति और भौतिक संस्कृति को सभ्यता के नाम से जाना जाता है। ‘सभ्यता’ का अर्थ है जीने के बेहतर तरीके। प्रायः सभ्यता और संस्कृति को समानार्थी समझ लिया जाता है, जबकि ये दोनों अवधारणाएँ अलग-अलग हैं। इनमें अन्तर ठीक वैसा ही है, जैसे हम एक फूल को सभ्यता और उसकी सुगन्ध को संस्कृति कहें। सभ्यता से ही किसी संस्कृति की बाहरी चरम अवस्था का बोध होता है। संस्कृति विस्तार है तो सभ्यता कठोर स्थिरता। सभ्यता में भौतिक पक्ष प्रधान है, जबकि संस्कृति में वैचारिक पक्ष प्रबल होता है। यदि सभ्यता शरीर है तो संस्कृति उसकी आत्मा। संस्कृति में परंपरागत चिंतन, कलात्मक अनुभूति, विस्तृत ज्ञान एवं धार्मिक आस्था का समावेश होता है। सभ्यता में मनुष्य की भौतिक प्रगति में सहायक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और वैज्ञानिक उपलब्धियाँ सम्मिलित होती हैं। संस्कृति हमारे सामजिक जीवनप्रवाह की उद्गमस्थली है और सभ्यता इस प्रवाह में सहायक उपकरण। संस्कृति साध्य है और सभ्यता साधन।

इस बात को उदाहरणों के माध्यम से सरलता से समझ सकते है-प्रारम्भ में मनुष्य आँधी-पानी, सर्दी-गर्मी सब कुछ सहता हुआ जंगलों में रहता था, धीरे-धीरे उसने इन प्राकृतिक विपदाओं से अपनी रक्षा के लिए पहले गुफाओं और फिर क्रमशः लकड़ी, ईंट या पत्थर के मकानों की शरण ली। अब वह लोहे और सीमेन्ट की गगनचुम्बी ईमारतों का निर्माण करने लगा है। प्राचीन काल में यातायात का साधन सिर्फ मानव के दो पैर ही थे। फिर उसने घोड़े, ऊँट, हाथी, रथ और बहली का सहारा लिया। अब मोटर और रेलगाड़ी के द्वारा थोड़े समय में बहुत लम्बे फासले तय करता है, हवाई जहाज द्वारा आकाश में भी उड़ने लगा है। पहले मनुष्य जंगल के कन्द, मूल और फल तथा आखेट से अपना निर्वाह करता था। बाद में उसने पशु-पालन और कृषि के आविष्कार द्वारा आजीविका के साधनों में उन्नति की। पहले वह अपने सब कार्यों को शारीरिक शक्ति से करता था। बाद में उसने पशुओं को पालतू बनाकर और सधाकर उनकी शक्ति का हल, गाड़ी आदि में उपयोग करना सीखा। अन्त में उसने हवा पानी, वाष्प, बिजली और अणु की भौतिक शक्तियों को वश में करके ऐसी मशीनें बनाईं, जिनसे उसके भौतिक जीवन में काया-पलट हो गई। मनुष्य की यह सारी प्रगति सभ्यता कहलाती है।

इसके विपरीत, संस्कृति आन्तरिक अनुभूति से सम्बद्ध है जिसमें मन और हृदय की पवित्रता निहित है। इसमें कला, विज्ञान, संगीत और नृत्य और मानव जीवन की उच्चतर उपलब्धियाँ षामिल हैं जिन्हें सांस्कृतिक गतिविधियाँ कहा जाता है। संस्कृति मानव के अन्तर्मन का उच्चतम स्तर है। जब एक व्यक्ति की बुद्धि और अन्तरात्मा के गहन स्तरों की अभिव्यक्ति होती है तब हम उसे ‘संस्कृत’ कहते हैं।

इस प्रकार भारत की पहचान कई चीजों को मिला-जुलाकर बनी है जिसमें भारत का लम्बा इतिहास, विलक्षण भूगोल और सिन्धु घाटी की सभ्यता, वैदिक युग, बौद्ध धर्म एवं स्वर्ण युग की शुरुआत और उसके अस्तगमन के साथ फली-फूली अपनी खुद की प्राचीन विरासत शामिल हैं। इसके साथ ही पड़ोसी देशों के रिवाज, परम्पराओं और विचारों का भी इसमें समावेश है। पिछली पाँच सहस्राब्दियों से अधिक समय से भारत के रीति-रिवाज, भाषाएँ, प्रथाएँ और परंपराएँ एक-दूसरे से परस्पर संबंधों में महान विविधताओं का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करती आ रही हैं। भारत कई धार्मिक प्रणालियों जैसे कि हिन्दू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म का जनक है। इस मिश्रण से भारत में उत्पन्न हुए विभिन्न धर्म और परम्पराओं ने विश्व के अलग – अलग हिस्सों को भी काफी प्रभावित किया है। सभी समाज-वैज्ञानिकों में एक सामान्य सहमति है कि भारत में मनुष्यों द्वारा प्राप्त सभी आन्तरिक और बाह्य व्यवहारों के तरीके समाहित हैं। अतः स्पश्ट है कि सनातन अथवा हिन्दू धर्म-संस्कृति सभ्यता और संस्कारों पर ही आधारित है। धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन तीनों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। भारत की महानता में इनका महत्वपूर्ण योगदान है और इन्हीं के कारण भारत अद्वितीय है।

Leave a Reply