आत्मप्रकाश: अप्प दीपों भव

प्रो.उर्मिला पोरवाल सेठिया
बैंगलोर

त्यौहार या उत्सव हमारे सुख और हर्षोल्लास के प्रतीक है जो परिस्थिति के अनुसार अपने रंग-रुप और आकार में अलग हो सकते हैं। साथ ही त्यौहार मनाने के विधि-विधान भी भिन्न हो सकते है किंतु इनका उद्देश्य आनंद प्राप्ति या किसी विशिष्ट आस्था का संरक्षण करना ही होता है।

हमारे देश में पर्वों का विभाजन मूलत: तीन प्रकारों से किया गया है।
पहले हैं अवतारों से संबद्ध पर्व, जैसे जन्माष्टमी, रामनवमी।
दूसरे हैं सार्वजनिक उत्सव, जैसे दीपावली, होली, दशहरा।
तीसरे हैं व्रत, जैसे एकादशी, महाशिवरात्रि और नवरात्रि आदि।

सभी त्योहारों से कोई न कोई पौराणिक कथा अवश्य जुड़ी हुई है और इन कथाओं का संबंध तर्क से न होकर अधिकतर आस्था से होता है। यह भी कहा जा सकता है कि पौराणिक कथाएं प्रतीकात्मक होती हैं।

इनके अलावा विभिन्न संतों-आचार्यों की जयंतियां भी पवित्र तिथियों के रूप में मनाई जाती हैं। इनमें, स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक उत्सव सर्वाधिक लोकप्रिय हैं और उनमें भी दीपावली तो जैसे पर्वों का शिखर है।

कार्तिक मास की अमावस्या के दिन दिवाली का त्यौहार मनाया जाता है। दिवाली को दीपावली भी कहा जाता है। दिवाली एक त्यौहार भर न होकर, त्यौहारों की एक श्रृंखला है। इस पर्व के साथ पांच पर्व जुड़े हुए हैं। सभी पर्वों के साथ दंत-कथाएं जुड़ी हुई हैं। दिवाली का त्यौहार दिवाली से दो दिन पूर्व आरम्भ होकर दो दिन पश्चात समाप्त होता है।

दिवाली का शुभारंभ कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन से होता है। इसे धनतेरस कहा जाता है। इस दिन आरोग्य के देवता धन्वंतरि की आराधना की जाती है। इस दिन नए-नए बर्तन, आभूषण इत्यादि खरीदने का रिवाज है। इस दिन घी के दिये जलाकर देवी लक्ष्मी का आहवान किया जाता है।

दूसरे दिन चतुर्दशी को नरक-चौदस मनाया जाता है। इसे छोटी दिवाली भी कहा जाता है। इस दिन एक पुराने दीपक में सरसों का तेल व पाँच अन्न के दाने डाल कर इसे घर की नाली ओर जलाकर रखा जाता है। यह दीपक यम दीपक कहलाता है।

एक अन्य दंत-कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन नरकासुर राक्षस का वध कर उसके कारागार से 16,000 कन्याओं को मुक्त कराया था।

तीसरे दिन अमावस्या को दिवाली का त्यौहार पूरे भारतवर्ष के अतिरिक्त विश्वभर में बसे भारतीय हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इस दिन देवी लक्ष्मी व गणेश की पूजा की जाती है। यह भिन्न-भिन्न स्थानों पर विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है।

दिवाली के पश्चात अन्नकूट मनाया जाता है। यह दिवाली की श्रृंखला में चौथा उत्सव होता है। लोग इस दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन की पूजा करते हैं।

शुक्ल द्वितीया को भाई-दूज या भैयादूज का त्यौहार मनाया जाता है। मान्यता है कि यदि इस दिन भाई और बहन यमुना में स्नान करें तो यमराज निकट नहीं फटकता।

दिवाली भारत में बसे कई समुदायों में भिन्न कारणों से प्रचलित है। दीपक जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियाँ हैं।

राम भक्तों के अनुसार दिवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध कर के अयोध्या लौटे थे। उनके लौटने कि खुशी यह पर्व मनाया जाने लगा।

कृष्ण भक्तों की मान्यता है कि इस दिन भगवान श्री कृण्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था। इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और लोगों ने प्रसन्नतापूर्वक घी के दीये जलाए।

एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात देवी लक्ष्मी व भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए।

जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही हुआ था।

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के अनुयायियों ने 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के स्वागत में लाखों दीप जला कर दीपावली मनाई थी। दीपावली मनाने के कारण कुछ भी रहे हों परंतु यह निश्चित है कि यह वस्तुत: दीपोत्सव है।

सिक्खों के लिए भी दिवाली महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था और दिवाली ही के दिन सिक्खों के छ्टे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को कारागार से रिहा किया गया था।

नेपालियों के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष आरम्भ होता है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा बलि ने देवताओं को बंदी बना लिया था। तब विष्णु ने वामन का रूप धारण कर देवताओं सहित लक्ष्मी को राजा बलि के बंदीगृह से दीपावली के दिन ही मुक्त कराया था। शक्ति-आराधक बंगाल में इस दिन शक्ति की देवी काली की पूजा का प्रचलन है। इस तरह कई अर्थों में इस दिन घर-आंगन रोशन करने का रिवाज है।

दीपावली प्रकाश पर्व है। हर तरह के अंधकार के विनाश का पर्व। इसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आसुरी शक्तियों पर विजय के उपरांत अयोध्या आगमन के दिन से जोड़कर देखा जाता है और कहा जाता है कि इस दिन अयोध्यावासियों ने अपने राजा के आगमन पर दीपावली सजाकर खुशियां मनाई थीं।

दीपावली के दिन लक्ष्मी-गणेश की पूजा का प्रचलन है। लक्ष्मी यानी धन की देवी और गणेश बुद्धि के देवता। धन और बुद्धि का समन्वय जरूरी है। बुद्धिमानों के पास धन-वैभव हो तो उसका सार्थक उपयोग हो सकता है। किंतु यदि बुद्धिहीनों के पास हो तो उसके दुरुपयोग की ही संभावनाएं अधिक होती हैं। लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा का निहितार्थ यही है कि धन के साथ विवेक बना रहे।

समय के प्रवाह में दीपावली मनाने के पीछे की श्रद्धा क्षीण हुई है। दंभ बढ़ा है। पहले मिट्टी के दीये शुद्ध घी या सरसों के तेल से जलाए जाते थे, देवताओं के चबूतरों पर घर की देहरी के दोनों ओर, कुंओं पर पर, पड़ोस के खेत के बीच धान की राशि पर और तुलसी के बिरवे के पास दीये जरूर जलाए जाते थे और उन्हें नमन किया जाता था। अब सिर्फ रोशनी की जाती है। बिजली के बल्बों की रंग-बिरंगी झालरें लगाई जाती हैं और उनके माध्यम से हैसियत का प्रदर्शन होता है। पटाखे फोड़े जाते हैं, उन्माद में वातावरण प्रदूषित किया जाता है। व्यवसायी जुए में रात-रात भर मशगूल रहते हैं, उनका यही लक्ष्मी-पूजन है। ऐसा कहते है कि नए जमाने की लक्ष्मी कमल पर नहीं विराजतीं, उल्लू की सवारी करती हैं। इसीलिए उनके आराधक जुए और शराब के सेवन से उनकी आराधना करते हैं।

दरअसल इस पर्व का सटीक संदेश भगवान बुद्ध के अप्प दीपो भव में निहित है। अप्प दीपो भव यानी अपने दीपक खुद बनो। अप्प दीपो भव के माध्यम से उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति को खुद के लिए जिम्मेदार बनने का संदेश दिया है। जब हम खुद के प्रति जिम्मेदार बनते हैं, तो सुव्यवस्था का सृजन खुद-ब-खुद हो जाता है।

हम आत्मालोचन करते हैं तो अपनी आदतें भी सुधारते हैं। अपनी आदतें सुधारेंगे तो उसका असर परिवेश पर आसपास के लोगों पर पड़ेगा ही।

उपभोक्तावाद के इस युग में जहां धन में बेहद इजाफा हुआ है, व्यक्ति का जीवन-स्तर बढ़ा है, वहीं तनाव भी खूब बढ़ा है। ईर्ष्या-द्वेष में भी इजाफा हुआ है। धन-लोलुपता बेतहाशा बढ़ी है। लूट-खसोट, हत्याओं से लेकर आत्महत्याओं तक में बेहद इजाफा हुआ है। ब्लड प्रेशर और शुगर के मरीजों की बाढ़ आ गई है। त्याग और धन के प्रति निर्लिप्ति में कमी आई है। लक्ष्मीजी का आसन कमल है। कमल का पत्ता पानी में रहकर भी भीगता नहीं। उससे निर्लिप्त रहता है। इसी तरह धन से भी निर्लिप्ति हो तो उसकी सार्थकता है। धन के मद में डूब गए तो सचमुच डूब गए। लक्ष्मीजी पछताएंगी आपको उपकृत करके।

दिवाली आसुरी शक्तियों पर विजय का प्रतीक-पर्व है। यह पर्व चेतना-पर्व के रूप में मनाया जाना चाहिए। प्रकाश का अर्थ ही यही है : आत्मप्रकाश, सचेतनता यानी अप्प दीपो भव। दीपावलियां हमें समूह की शक्ति का भी संकेत देती हैं। यहां अकेला दीपक नहीं जलाया जाता, दीपों की पंक्तियों होती हैं। दीपों के समूह में उनकी शोभा और निखर आती है। प्रकाश द्विगुणित हो जाता है। संदेश यह है कि हमें भी आसुरी शक्तियों के खिलाफ अंधकार के खिलाफ जुड़कर संघर्ष करना चाहिए।

दीपावली उल्लास पर्व भी है। सफाई का पर्व भी है। वर्षा के जाने और शरद के आगमन का पर्व भी है। अमावस्या के ठीक पहले की शरद पूर्णिमा के ऐश्वर्य का वर्णन साहित्यिक ग्रंथों में भरा पड़ा है। शरद की पूर्णिमा को ही गोपियों के साथ कृष्ण रास रचाते हैं। हिंदी के भक्तकवि सूरदास और संस्कृत के पीयूष वर्ष जयदेव के यहां रासलीला का अद्भुत वर्णन है। ऐसी उजली और रुपहली चांदनी वर्ष में कभी नहीं आती। जिस तरह शरद पूर्णिमा की चांदनी की मनोहरता हमें मोह लेती है, उसी तरह इस माह की अमावस्या की अंधेरी रात हमें डराती है। इतना अंधेरा भी वर्ष में कभी नहीं आता। हम इस अंधेरे को दीपावलियों के प्रकाश से चीरते हैं और इस पर विजय पाते हैं। हमारे यहां शास्त्रों में सर्वत्र तमसो मा ज्योतिर्गमय का ही संदेश दिया गया है।

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