जीवन के अनंत दुखों से मुक्ति !


मधुरिता

सभी जीवों में श्रेष्ठतम मानव ही जब इस दुःख के भंवर को पार करने में अपने को असक्त समझता है तो अन्य जीवों की बात ही क्या है ? यूँ तो जब पाप पुण्य बराबर होते हैं तभी मानव जन्म मिलता है । प्रायः सभी को एक शिकायत तो अक्सर रहती ही है —— बुरा काम कोई नहीं किया, किसी को सताया या परेशान भी नहीं किया —- फिर भी दूसरे लोग परेशान करते हैं, और जीवन में दुःख रहता ही है ।

सुख दुःख का स्थान तो मन में रहता है । मन वहीं है —जहां अनंत विचारों का पुंज है ।

अच्छे बुरे विचारों का मन में द्वन्द चलता रहता है — जो विचार गहरी छाप छोड़ता है  वही क्रिया में आ जाता है और हम अच्छे बुरे कर्म करने में लग जाते हैं ।

जहां से दुःख का उदगम हुआ है वहीँ से उसका समाधान संभव है । बाहर जितना भी प्रयास करें कसी से मदद लेने की सोंचे की हमारा दुःख दूर हो जाएगा । लेकिन ऐसा होना संभव नहीं है । बेहतर है की हम अपने अनंत मन में जाएँ और वहीँ से विचारों को शुद्ध करें , तभी हमें दुखों से मुक्ति मिल सकती है । बाहर की परिस्थितियों में इसका समाधान खोजना संभव नही है ।


दुःख की निवृति के लिए हम कुछ उपायों को अपना सकते हैं –


जीवन की हर समस्या का समाधान प्रायः अंदर की है । यह जितना सच है उतना ही अविश्वनीय जान पड़ता है ।
हम जितनी आतंरिक शक्ति के साथ तथा तन्यमता से किसी समस्या का विश्लेषण कर के उसका निराकरण करेंगें उतनी ही सफलता मिलेगी ।

मन बुद्धि विचार करने की शक्ति जब दूषित हो जाती हैं, तभी मानसिक दुखों का प्रारम्भ होता है ।
हमें अपने में तो हज़ारों गुण दिखाई देते है मगर हम दूसरों में हमेशा अवगुण देख कर उनके प्रति नकारात्मक विचार रखते हैं । हमारे मन में जो बात पैठ जाती है उसी के अनुसार हम सामने वाले से व्यवहार करते हैं । पति पत्नी या भाई भाई से तू-तू , मैं -मैं इतना विकराल रूप ले लेता है की कचहरी के चक्कर लगाने पड़ जाते हैं ।
तत्ववत सभी एक हैं , लेकिन विचारों से भिन्न भिन्न हो कर भी जीवन को सरल – सहज व आनंद में बिता सकते हैं, यह अपने आप पर निर्भर करता है ।

कलियुग में बुरे कर्म करने की मन की स्वाभाविक प्रवृति रहती है। अच्छे कर्म करने में मन की रूचि कम होती है। इस प्रवृति को हमें अभ्यास से, अच्छे विचारों, अच्छे सत्संग से तथा आत्मविश्लेषण कर मन का सदैव निरीक्षण करने की आवश्यकता है ।

सभी अपने को स्वतंत्र मानते हैं । पर तनिक विचार तो कर के देखें की आपकी स्वतंत्रता कहाँ तक सार्थक है । जी हाँ आप तो अपने ही मन, अपने ही व्यवहार, अपने ही बुद्धि और अपने ही शरीर के गुलाम हैं ।
जो व्यवहार आप अपने लिए नहीं चाहते हैं वह दूसरों के लिए करेंगें और साथ में यह इच्छा भी करेंगें की आप सुखी हो जायेंगें तो यह हो ही नहीं सकता है। यह तथ्य उतना ही सत्य है जितना की स्वयं ईश्वर ।

गुरु कृष्ण वैष्णव तीन की दया हुई ।
एक की दया बिना जीव की दुर्दशा हुई ॥
एक है मन । अपने मन की कृपा होनी चाहिए ॥

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