आहार शुद्धि

मधुरिता  

मानव जब से इस धरा -धाम पर आया है तभी से सुख की ख़ोज कर रहा है परन्तु प्रायः सुख की जगह दुःख ही हाथ लगता है |श्रीमदभगवद्गीता में सुख प्राप्ति की विवेचना हुई है यों तो संसार अनित्य है परन्तु इसका सार है -भागावद्प्राप्ती |इसका अर्थ यह नहीं हुआ की इसके लिए संसार का त्याग किया जाय |गीता के अनुसार संसार का त्याग नहीं बल्कि संसार के प्रति आसक्ति का त्याग होना चाहिए |

परन्तु यह भी इतना ही सत्य है की हम सभी संसार में आसक्त हैं और यह आसक्ति कैसे दूर हो इसकी तकनीक गीता में बताई गयी है – यथा ज्ञानयोग , भक्तियोग , कर्मयोग ,राजयोग शरणागति योग आदि आदि |

इन सभी योगों को अपने शरीर के बिना प्राप्त नहीं किया जा सकता है -सभी योगों का साधन तो शरीर ही है वह अन्न के आधार पर टिका हुआ है | अन्न और मन का सीधा संबंध है | आज संसार में हाहाकार है | ज्ञान है-पर ज्ञानयोगी नहीं , कर्मठ हैं-पर कर्मयोगी नहीं , राजा हैं-पर राजयोगी नहीं | इसके कई कारण है – योगी होने के लिए गीता में युक्ताहार विहार की बात कही गयी है –

१ आयु , उत्साह , बल आरोग्य , चित्त की प्रसन्नता और रूचि बढ़ाने वाले या मधुर ,स्नेहमय घृत आदि युक्त्त या स्निग्धकारक पुष्टिकर या स्थायी सुफल दायक , रुचिकर और स्वादिष्ट खाद्यपदार्थ सात्विक लोगों के प्रिय अर्थात् उपयोगी सत्वगुणवर्धक है |


२ कटु,खट्टा,लवणयुक्त,अतयंत,गरम,तीक्ष्ण,रुखा और दाहकारक आहार रजोगुणी व्यक्तियों को प्रिय होता है तथा वह दुःख चिंता और रोंगों को उत्पन्न करता है |

३ जो भोजन अध् पका रस रहित दुर्गन्ध युक्त बासी उच्छिष्ट और अपवित्र है वह तमोगुणी व्यक्तियों को प्रिय होता है |

आज संसार में हिंसा है असत्य है असंयम है – इसका मूल कारण है – हमारा आहार तमोगुणी है तो मन शुद्ध तथा सात्विक कैसे होगा ?असत्य तथा अशुद्ध आचरण के द्वारा अर्जित धन हमारे मन में अशुद्धता तथा असत्यता को बढ़ता है | अतः हमें सबसे पहले अपने आहार को शुद्ध करने की आवश्यकता है |

आहार का अर्थ – अपनी इन्द्रियों के द्वारा शरीर में जो प्रवेश करता है वही आहार कहलाता है अर्थात मुख से अन्न लेना ही केवल आहार नहीं है- कर्ण से सुनना , आँखों से देखना , हाथ से स्पर्श करना आदि भी आहार ही है |गीता में इन सभी आहारों की विवेचना है |

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