मन की व्यथा



मन की व्यथा सुनाकर हारे

जब से दीप जलाया है अनन्य विश्वास का
हर पल नवीनता की उमग
कुछ प्रेरणा देती है उन्मुक्त विचार
फिर भी उसे न समझ सका
यही है मानव मन की व्यथा
जीवन की गति में अपनी गति ना मिला सका
सर्व ज्ञान से दूर रहा
विनती हमारी स्वीकारो प्रभु जी
हमें भी गति की मूलता समझा दो ना
मन की व्यथा सुनाकर हारे
कृपासिन्धु अब तो दे दो अनंत ज्ञान
दर्शन तेरा निशिदिन पाऊँ सारे भेद मिटाओ
रहे सदा हम शरण तुम्हारे
ऐसी कृपा करो हे स्वामी
मन में न रहे कोई व्यथा
मन की व्यथा सुनाकर हारे ||
                                              -मधुरीता

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