श्री दादा देव महाराज सबकी मुराद पूरी करते हैं

“पूजा करो इस देव की, पूर्ण होगी आश
जो आया इस देव पर, गया नहीं निराश”

सुरेन्द्र सिंह डोगरा

श्री दादा देव महाराज का मन्दिर गाँव पालम सैक्टर-7, द्वारका में स्थित है। यह मन्दिर लगभग साढ़े आठ एकड़ भूमि में फैला हुआ है। श्री दादा देव महाराज 12 गाँव पालम, शाहबाद, बागडोला, नसीरपुर, बिंदापुर, डाबड़ी, असालतपुर, मटियाला, बापरोला, पूंठकला, गोयला व नागलराय आदि तथा आसपास की कालोनियों के निवासियों द्वारा विशेष आस्था स्वरूप पूजे जाते हैं।

मन्दिर की ही श्री दादा देव मन्दिर प्रबन्धक सभा (बारह गाँव) पालम (पंजीकृत) धार्मिक संस्थान का मानना है कि श्री दादा देव महाराज विक्रम संवत 838 (781 इसवीं) में राजस्थान के एक छोटे से गाँव टोडा रॉय सिंह जिला टौंक में अवतरित हुए। एक किंवदन्ति, किन्तु सत्य के अनुसार वे इसी गाँव में एक शिला पर सदा ही ध्यानस्थ बैठे रहते थे। ऐसा माना जाता है कि उनके इस ताप से प्रसन्न होकर स्वंम भगवान ने उन्हे देव शक्ति प्रदान की थी। तभी से वे वहाँ के लोगों का कल्याण करने लगे। समय आया और वे उसी शिला पर ध्यानस्थ ही पार्थिव शरीर छोड़कर बृहमलीन हो गए। परन्तु ग्रामवासी उसी शिला को उनका स्वरूप मानकर पूजते रहे, प्रतिफल में उनका कल्याण होता रहा तथा उनकी मनोकामना पूर्ण होती रही।

समय बीतता गया और एक समय ऐसा भी आया कि गाँव में आकाल पड़ गया, मजबूर होकर ग्रामवासियों ने गाँव छोड़कर अन्यत्र जाने का फैसला किया। परन्तु वे अपने देव को छोड़ अन्यत्र जाने को राजी न हुए तब उन्होने फैसला किया कि अपने देव स्वरूप शिला को भी साथ ले चलें। उस भारी-भरकम शिला को बैलगाड़ी में लाद दिया गया और सभी ग्रामवासी बरं से कूच कर गए। रास्ते में आकाशवाणी हुई हे भक्तों! मैं शिला रूप में हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा परन्तु यह शिला जिस स्थान पर गिर जाये उसी स्थान को अपना निवास स्थान बना लेना वही तुम्हारा गंतव्य स्थान होगा। अनेक दिनों तक चलते हुए वह शिला दिल्ली के समीप के गाँव पालम में शिला बैलगाड़ी से फिसल कर गिर गई। ग्रामवासियों ने इसी स्थान को अपना गंतव्य स्थान बना लिया और यहाँ-वहाँ बस गये। जिस स्थान पर शिला गिरी थी उसी स्थान पर शिला के ऊपर एक मढ़ी बना दी। इस प्रकार 12 गाँव बसे जो श्री दादा देव के आदेश और आशीर्वाद से बसे। दिल्ली सहित इन 12 गाँव (जो पालम बारह के नाम से जाने जाते हैं) के लोगों ने इन्हें अपना कुलदेवता माना और विधि पूर्वक पुजा अर्चना करने लगे। गौरतलब है कि यहाँ आने वाले भक्तों की भीड़ दिन-प्रतिदिन बढ़ती गई। श्री दादादेव भी सभी का कल्याण करने लगे।

वैसे तो यहाँ प्रतिदिन ही भक्तों की भीड़ लगी रहती है परन्तु रविवार, अमावस्या व पुर्णिमा के दिन यहाँ लाखों भक्त पूजा अर्चना करने आते हैं। ऐसा माना जाता है कि दशहरे के दिन श्री दादा देव महाराज इस पृथ्वी पर अवतरित हुए और यह जयन्ती महोत्सव पूरे हर्षौल्लास के साथ मनाया जाता है और असंख्य भक्त इस दिन श्री दादा देव महाराज कि पुजा अर्चना कर अपने को धन्य मानते है। इस दिन यहाँ पर एक भव्य मेला लगता है।


“पूजा करो इस देव की, पूर्ण होगी आश
जो आया इस देव पर, गया नहीं निराश”
“दोहा ध्यान लगाकर हृदय से, सुमिर श्री दादा देव महाराज।
मन वांच्छित फल देवन हारे, सँवारे बिगड़े काज।
जय-जय दादा देव विधाता, दीनन के तुम हो सुखदाता।
टाँक-टोडा से हुआ निकासा, पालम गाँव में किया निवासा।
राजस्थान में रामदेव कहे, पालम में दादा देव काहाए।
श्वेत अश्व की करे सवारी, महिमा बहुत अपार तुम्हारी।“

 उक्त पंक्तियाँ श्री दादा देव महाराज चालीसा से ली गई हैं। जिसमें श्री दादा देव महाराज का परिचय व भक्तों के बिगड़े काम को सुगमता पूर्वक बनाने का व्याखान किया गया है। यदि आप भी अपनी कुछ मुराद पूरी करवाने चाहते हैं तो संकोच न करे और श्री दादा देव महाराज की स्तुति करें। महाराज सब पर कृपा करते हैं। ईश्वर के घर में देर पर अंधेर नहीं है।

सर्वकामना पूर्ण करने वाले श्री दादा देव महाराज जी के बारे में जो  यह चरित्र  २१ दिन लगातार पढ़ेगा उसके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जायेंगे। 

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