अमर शहीद लाला जगत नारायण जी के सपने साकार हो रहें है

-बलिदान दिवस को समर्पित विशेष लेख-

(एस. एस. डोगरा)

“सच्चे देशभक्त, समाजसेवी, नेता, शिक्षक, साहित्यकार, कलाकार, खिलाड़ी व पत्रकार प्रतेयक समाज, देश व सभ्यता के प्रमुख आईना होते हैं। इन्ही के महत्वपूर्ण योगदान पर किसी भी देश का अतीत, वर्तमान व भविष्य निर्भर करता है। ये सदा अमर रहते हैं।” जी हाँ इसी तथ्य को चरितार्थ कर अमर लाला जगत नारायण अजर अमर हो गए. अस्सी के दशक में जब पूरा पंजाब आतंकी माहौल से शुलग रहा था, उस दौर में भी कलम के सिपाही एवं देश भावना से प्रेरित लाला जी ने अपने बिंदास लेखन से आतंकियों के मंसूबों को उजागर किया और राज्य में शांति कायम करने के भरसक प्रयास किए. परन्तु 9 सितम्बर सन 1981 को इन्ही आतंकियों ने सच्चे देशभक्त एवं निडर पत्रकार लाला जी की हत्या कर दी.

आज उन्ही की पून्य तिथि पर समस्त समाज उन्हें पुरे देश और विदेशों में भी बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है. आइए इस अदभुत व्यक्तित्व के बारें कुछ रोचक तथ्यों को साझा किया जाए. गौरतलब है कि लाला जी का जन्म 31 मई 1899 को वजीराबाद, गुजरावाला जिले (अब पाकिस्तान) में हुआ था. उन्होंने उस वक्त लाहौर, पाकिस्तान में डी ए वी कॉलेज से स्नातक की डिग्री सन 1919 में करते ही लॉ कोलेज में दाखिला ले लिया. लेकिन देश भावना से ओतप्रोत लाला जी ने अपनी वकालत की पढाई को बीच में छोड़कर १९२० में ही राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के बुलावे पर असहयोग आन्दोलन मुहीम में शामिल हो गए. इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा जब उन्हें लगभग ढाई वर्ष जेल में रहना पड़ा. जेल ही में उन्हें प्रसिद्ध स्वंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय के निजी सचिव के तौर पर कार्य करने का सौभाग्य मिला. ये वही लाला लाजपत राय हैं जो एक पंजाबी लेखक थे जिन्हें आज भी पूरा देश पंजाब केसरी के नाम से पुकारता है.

वर्ष १९२४ में ही लाला जगत नारायण जी को भाई परमानन्द द्वारा प्रकाशित आकाशवाणी नामक साप्ताहिक समाचार पत्र में बतौर संपादक का कार्यभार मिला. यही से लाला जी के पत्रकारिता जीवन की उम्दा शुरुआत हुई. लेकिन उनमें देशभावना के प्रति उत्साह कूट कूट कर भरा था. तभी तो वे सभी सत्याग्रह आन्दोलन का प्रमुख हिस्सा बने रहे और देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए लगभग नौ वर्ष तक कारावास भी काटा. बल्कि लाला जी की पत्नी को भी छ: महीने जेल काटनी पड़ी. जबकि उनके सबसे बड़े बेटे रमेश चोपड़ा को भी भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार भी किया. लेकिन लाला जी ने इन सब विपरीत परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारी. लाला जी ने राजनैतिक क्षेत्र में सक्रीय रहते हुए लाहौर शहर में कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद को बखूबी सात वर्ष तक निभाया. इसके अलावा लगभग तीस वर्षों तक आल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य के रूप में अपनी हरसंभव सेवाएँ प्रदान की. 

देश के आजाद होने के उपरांत, सन 1948 में लाहौर, पाकिस्तान से पलायन कर जालंधर, पंजाब हिन्द समाचार नामक उर्दू दैनिक अख़बार का शुभारम्भ किया. लेकिन तत्काल समय में उर्दू के अख़बार को ज्यादा लोकप्रियता नहीं मिल पाई और सन 1965 में लालाजी ने पंजाब केसरी दैनिक हिन्दी समाचार पत्र की स्थापना कर डाली. जिसे पहले उत्तर भारत के राज्यों तथा बाद में मध्य एवं पूर्व और पश्चिम राज्यों में भी खूब लोकप्रियता मिली. लालाजी आर्य समाजी विचारधारा में विश्वास रखते थे और वे अपने जीवनकाल में हमेशा ही आदर्श परिवार एवं आदर्श समाज स्थापना तथा नैतिक कर्तव्य एवं योगदान के लिए प्रेरणास्रोत रहे.

भले ही उनकी आतंकियों ने निर्मम हत्या कर दी हो लेकिन आज भी पत्रकारिता क्षेत्र और बौद्धिक समाज में लाला जी को विशेष आदर एवं सम्मान के नजीरए से याद किया जाता है. स्वतंत्रता सेनानी तथा पंजाब केसरी समाचारपत्र समूह के संस्थापक लाला जगत नारायण जी को अपने जीवनकाल में सच्ची देशभक्ति एवं समाज सेवा प्रदान करने हेतु भारत सरकार ने सन 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कर कमलों द्वारा डाक टिकट जारी किया गया. आज लालाजी के बताए सद्कर्मों पर ही चोपड़ा परिवार पत्रकारिता एवं समाजसेवा में विशेष योगदान दे रहा है. इसी कड़ी में लालाजी के सपनों को साकार करने में उन्ही की पौत्र वधु श्रीमति किरण चोपड़ा जी द्वारा गठित वरिष्ठ नागरिक क्लब बुजुर्गों में महत्तवपूर्ण भूमिका अदा कर रही है. 

किरण चोपड़ा जी ने हिन्द पाकेट बुक्स प्रकाशक द्वारा प्रकाशित “जिन्दगी का सफ़र” नामक अपनी तीसरी पुस्तक में अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए लिखा है “लाला जी की अंतिम इच्छा या यूँ कह लें उनका सपना था कि वे देश में बुजुर्गों के लिए कुछ होना चाहिए. जो वह कहते थे, करके दिखाते थे, परन्तु उनकी देश के लिए आकस्मिक शहादत ने उन्हें यह करने के अवसर नहीं दिया. आज वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब उनके अधूरे सपने को पूरा करने का प्रयास है. उनकी अंतिम इच्छा को मूर्तरूप देने का प्रयास है. आज बहुत से लोग हमसे मिलने आते हैं और लाला जी और रमेश जी के कार्यों को याद करके उनकी मिसाल देते हैं, तो हमारा सिर गर्व से ऊँचा हो जाता है. लाला जी के साथ मैंने जिन्दगी के तीन साल बिताए, परन्तु उन तीन सालों ने मेरे मन-मस्तिष्क पर तीन हजार सालों के बराबर अमित छाप छोड़ी है, जो कभी भुलाई नहीं जा सकती. मैं लाला जी की एक मात्र पौत्र वधु हूँ जिसको उनका आशीर्वाद प्राप्त हुआ. शादी के समय मैं पढ़ रही थी. घर में बहुत लोग थे, सब उनकी सेवा करते थे, परन्तु क्योंकि मैं उनकी पौत्रवधु थी, यह उनका मेरे प्रति लाढ-प्यार था कि वह सुबह की चाय और शाम पांच बजे की चाय-पकोड़े मेरे हाथ से लेना पसंद करते थे. सचमुच लाला जी एक संस्कारवान घर के मुखिया, एक आजादी के सिपाही, एक देशभक्त थे, जिन्होंने सच्चाई पर चलते हुए देश की एकता के लिए अपनी जान दे दी. आओ! हम सब मिलकर उनके बताए सच्चे मार्ग पर चलने का प्रयास करें.”

वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब की संस्थापक किरण जी द्वारा लिखित पुस्तक में अंकित उक्त भावपूर्ण पंक्तियों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि लाला जी ने अपने पुत्र, पौत्र, समाज के अलावा अपनी पौत्र वधु को भी प्रेरित कर परिवार का नाम रौशन करने की प्रेरणा दी. वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब को समर्पित चंद पंक्तियाँ: 


“क़दमों की धूल नहीं, माथे की है शान 
वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब ही है
सच्ची समाज सेवा की पहचान
जिसके माध्यम से होता है
बुजुर्गों को हरसंभव कल्याण”

आपको जानकर हर्ष होगा कि 9 सितम्बर 2004 में ही वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब की स्थापना हुई थी आज इसे स्थापित हुए करीब 12 वर्ष हो गए हैं इसकी सदस्यता ग्रहण करने हेतु बुजुर्गों की संख्या दिनों दिन बढती ही जा रही है. लेकिन किरण जी के बुलंद हौंसले, समर्पण, अश्विनी चोपड़ा जी के मार्गदर्शन, पंजाब केसरी समूह एवं वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब के सामूहिक प्रयासों के कारण ही लाला जी के सपने साकार हो रहे है.

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