कोई कारन तो होगा बन्दे !

आर. डी. भारद्वाज “नूरपुरी”

इक झोली में फ़ूल भरें हैं इक झोली में काँटे रे,
तेरे बस में कुछ भी नहीं, ये तो बाँटने वाला ही बाँटे रे,
कोई कारन होगा बन्दे , कोई कारन होगा !!

पहले बनती है तकदीरें फिर बनतें हैं शरीर,
ये तो दाता की है कारीगरी, तू क्यों बैठा गम्भीर,
साँप भी डस ले तो मिल जाए किसी को जीवन-दान,
चींटी से भी मिट सकता है, किसी का नामोनिशान,
कोई कारन तो होगा बन्दे , कोई कारन होगा !!

धन से बिस्तर तो मिल जाए, पर नीन्द को तरसें नैन,
नन्गे फर्श पर भी सोकर भी आए किसी के मन को मिल जाये चैन,
सागर से भी बुझ सकती नहीं कभी किसी की प्यास,
और कभी एक ही बूँद से मिट जाती है तड़़पते मन की प्यास ,
कोई कारन तो होगा बन्दे , कोई कारन होगा !

छोड़दे दुनियादारी के झमेले, निरंकार पे रख विश्वास ,
कर्म कर अपने अच्छे , सब को प्रेम प्यार से मिल ,
खुश होकर दाता तेरी फटी तकदीरें भी देगा सिल ,
पत्थर में बैठे कीढ़े को भी यह देता है खाना और स्वास,
कोई कारन तो होगा बन्दे , कोई कारण होगा !

यह भी कोई जरुरी नहीं कि निरंकार के सारे खेल समझ में आ जाएँ,
यह भी जरुरी नहीं कि तेरे सभी उलझे हुए तंद सुलझ जाएँ ,
जरुरी तो है भारद्वाज ! जो बात बन जाए, उसके लिए कर दाता का शुकराना ,
फिर किसने रोका है, एक रहमत मिल जाने पर दूसरी अर्जी नहीं लगाना ?
सत्गुर माता जी मुरादें पूरी करती हैं सबकी, कब कहाँ और कैसे, यह सवाल नहीं उठाना,
क्योंकि, प्यारी साध-संगत जी ! उनकी ओर से विलम्भ होने का भी,
कोई कारन तो होगा बन्दे, कोई कारण होगा !

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