झूठी मैरिट के ढकोंसले !

गुरु द्रोण की फौज कहलाने वाले, परशुराम से शिक्षा पाने वाले,

तुम क्या जानो मैरिट को, तुम तो सदियों से आरक्षित हो ।
क्योंकि तुम्हारे और तुम्हारी हज़ारों पीढ़ियों के लिए तो
नौकरियां , व्यवसाय , कोठियाँ , खेतीबाड़ी की जमीने, बाग़ – बगीचे
और नौकरशाही – सब कर दिए थे आरक्षित उस मनु महाराज ने !
और तब से कानून करवा दिया लागू , देश और पूरे समाज में !

अर्जुन की भी खूब चल निकली थी, बना दिया धोखे से सर्व श्रेष्ठ धनुर्धर,
छल्ल कपट से काट दिया वो चनौती वाला अंगूठा (एकलव्य) मेरिट का ,
क्योंकि एकलव्य तो था बेटा एक दलित (भील ) का,
और तुम तथाकथित श्रेष्ठ कुल वाले , राज घराणों मेँ
जन्म लेने वालो, कैसे कर लेते सवीकार एक दलित को ,
अपने से अधिक बुद्धिमान, शक्तिमान , अपने से अधिक श्रेष्ठ !

फिर बिन चुनौती सविकारे ही वंचित किया एक सूत पुत्र (कर्ण) को ,
परिस्थितिवश बर्ह्मास्त्र के प्रयोग से,
क्या यही है तुम्हारी संस्कृति, यही है तुम्हारी सभ्यता ?
क्या ऐसे ही मुकाबला करते आए हो प्रतिस्पर्धियों से ?
यहाँ निम्न वर्ग को न्याय नहीं , सम्मान नहीं ,
समानता का अधिकार नहीं, शिक्षा नहीं , इज्जत नहीं,
उनके लिए तो कर दिए थे बंद सब गुरुकुलों के दरवाज़े,
मन्दिरों और अन्य धर्म स्थलों में कर दिए प्रवेश वर्जित,
और छीन लिए थे उनके सब सुख और साधन ?
फिर वह कैसे और कहाँ निखारते अपने भीतर छिपी
कला को , बुद्धि और अनेकों व्यवसाय चलाने बारीकियों को,
रण कौशल को ? राजनैतिक , सामाजिक और आर्थिक अधिकारों से वन्चित –
कैसे वोह पाण लगाते अपने अन्दर छलकते फ़न को , कला को ?
और न जाने कितने क्षेत्रों में कैसे करते अपने को तीक्ष्ण ?

शर्मसार किया तुमने हज़ारों बार मानवता को ,
झूठे जाति और धर्म के फन्दों से, और न जाने कितने पाखण्डो से ,
कभी डोनेशन, कभी व्यापम और सिफारिश के कुचक्रों से ,
कभी मैनेजमेंट कोटा की सीटों से , कभी नोटों से तो कभी वोटों से ,
हमेशा घुसते आए हो इन चोर दरवाजों से,
कभी कॉलोजों में , युनिवर्सिटियों में, तो कभी सत्ता के गलियारों में ,
और फिर भी बड़ी बेशर्मी से कहते हो , हम मैरिट हैं ?


याद रखो ! यह मैरिट नहीं, मात्र एक धोखा था ,
कल से नहीं, परसों से नहीं , साल दो साल से नहीं ,
यह धोखा तुम करते आये हो दस हज़ार वर्षों से ,
धोखे से छीना उनसे , घर बार, खेत खलियाण ही नहीं ,
उनके लाखों पुरखों से , उनके जीवन यापन के सुख और साधन ,
उनके लाखों , लाखों रोजगार और व्यवसाय ,
उनके सम्मान और सामाजिक समानता के अधिकार ?
और इस निरन्तर छीना झपटी से कर दिया ,
उनको और उनकी लाखों पीढ़ियों को कंगाल , साधन और सत्ता विहीन !
और बना दिया उनको सदियों – २ तक दलित समाज और अपेक्षित वर्ग,
कभी षडयन्त्र से किया वध शम्भूक का ,
तो कभी छल्ल से काटा गला शोंण का !

मगर अब नहीं है तुम्हारी चलने वाली ,
हमारा एक ही विद्धवान और उच्चकोटि वकील ,
तुम्हारे हज़ारों धोखेबाज़, लुटेरों पर बन बैठा भारी ,
क्योंकि झूठ के पाँव नहीं होते , सत्य तो होता ही है स्वंमभू बलवान ,
और अधर्मी होते हैं धोखा देने वाले , छल्ल कपट से हराने वाले ,
गलत नीतियों , कुरीतियों और पाखण्ड से दूसरों को छलने वाले ,
हमारे उस विद्वान , जुझारू और समाज सुधारक ,
युग परिवर्तक मसीहा ने बदल दिया तुम्हारा सब धोखे और पाखण्ड का खेल ,
और लिख दिया डॉ.अम्बेडकर ने, सत्य , निष्ठा, समानता
और सिद्धांतों पर आधारित एक अनूठा संविधान !
क्योंकि वह बहुत अच्छी तरह समझ चुका था – आर्थिक आज़ादी के बिना ,
बिलकुल अर्थविहीन ही है , राजनैतिक और समाजिक आज़ादी !

और अब हज़ारों वर्षों से दलित और शोषित
वर्ग के बच्चे ही पढ़लिख कर बदलेंगे अपनी तकदीर ,
और उनकी तदबीरों से बदलेगी पूरे भारत की तस्वीर ,
समझ सको तो समझ लो – वक़्त है अब भी ,
सम्भल सको सम्भल जाओ , वक़्त है अब भी ,
छोड़ दो इन साधन विहीन और संरक्षण विहीन –
दलित वर्ग को , और छोड़ दो इन पर करने शोषण , अत्याचार और अन्याय !
मत भूलो ! यह भी इसी भारत माता के बच्चे हैं ,
और इनको भी बढ़ना है आगे ही आगे , और बने रहना है –
निरन्तर उन्नति, विकास और परिवर्तन की डगर पर अग्रसर !

दस हजार से ज्यादा वर्षो से पूरे समाज को उलझाए रखा ,
पाखण्डों में, आडम्बरों में इन तथा कथित ऊँची जाति वालों ने ,
फंसाए रखा भोली भाली जनता को झूठे अन्ध विश्वासों में ,
और करते रहे करोड़ों गरीबों और मजलूमों का शोषण ,
बना डाला उनको अस्पृश्यता और छुआछूत के शिकार ,
झूठे तर्कों से , अविज्ञानिक सोच और विचारधारा से ,
और उस वक़्त के सैंकड़ों राजे रजवाड़ों से मिलकर की साजिशों से ,
और कर दिए थे बंद उनके लिए सब दरवाजे –
शिक्षा के , उन्नति के , विकास के , विछाके कांटे उनकी राहों में ,
और किये उनके साथ अमानवीय और पशुता जैसे व्यवहार !
ताकि वह सब बने रहेँ हमेशा के लिए इनके ग़ुलाम और खिदमतगार ,
डॉ.अम्बेडकर ने जला डाली थी तुम्हारी वोह छडयन्त्र रचित पुस्तिका – मनुसमृति !
और अब जब वह आज़ादी के साठ सत्तर वर्षों में ,
लगे जब थोड़ा चैन की सांसें लेने , पढ़ने लिखने –
तो तब यह लगे मचाने हल्ला गुल्ला व चीक चिहाड़ा ,
अगर हिम्मत है तो आप भी बन कर दिखाओ, ज्यादा नहीं बस पांच सौ वर्ष –
उन जैसे शुद्र , दलित, शोषित , अपेक्षित और अछूत ,
और भोगने दो पुराने दलितों को थोड़ा ठंग से , सलीके से ,
सत्ता सुख , खुशहाली , समृद्धि और अपार शक्तियों से अर्जित –
समाजिक , आर्थिक और राजनैतिक सुविधायों को ,
और फिर देखना वह कैसे निखारते हैं यह अपनी बुद्धि , और कला कौशल –
और सब क्षेत्रों में पछाड़ते हैं , इन तथाकथित स्वर्णो को ,
और फिर तब देखना कैसे तुम्हारी मैरिट को लगता है –
जंग और कैसे चाटती है दीमक तुम्हारी बुद्धि और किस्मत को !

और याद रखना ! जो देश – प्रदेश अपने नागरिकों के लिए नहीं बनाते,
समानता के अधिकार, नहीं देते उनको बढ़ने , फलने फूलने के बराबर अवसर ,
और यहाँ लड़कियों और औरतों पर होते रहते हैं आये दिन शोषण व अत्याचार ,
माना जाता है सब जगह उनको दूसरे दर्जे के नागरिक ,

वही देश पिछड़ जाते हैं सम्पूर्ण तौर पे अन्य प्रगतिशील और विकासशील देशों की श्रेणी में ,
और उनको बनना पड़ जाता है प्रगतिशील व विकासशील देशों के पिछलगु –
विकास में , प्रगति में , विज्ञानं में , विश्व मार्गदर्शन में , और ना जाने
कितने ही प्रतिस्पर्धा की राहों में, पगडंडियों में और शेष दुनियाँ की निगाहों में !
रचना : आर.डी. भारद्वाज “नूरपुरी “

डॉ. अम्बेडकर की १२५ वीं जन्म शताब्दी के शुभ अवसर पर

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