भारतीयता की उत्प्रेरक थी भगिनी निवेदिता : दयानंद वत्स

अखिल भारतीय स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक संघ एवं नेशनल चाइल्ड एंड वूमन डवलपमेंट चेरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में आज उत्तर पश्चिम दिल्ली स्थित संघ के मुख्यालय बरवाला में संघ के राष्ट्रीय महासचिव गांधीवादी विचारक एवं चिंतक दयानंद वत्स की अध्यक्षता में भारतीय संस्कृति की ध्वजवाहिका भगिनी निवेदिता की 150 वीं जयंती सांस्कृतिक समरसता दिवस के रुप में सादगी और श्रद्धा से मनाई गई। श्री वत्स ने भगिनी निवेदिता के चित्र पर माल्यार्पण कर.उन्हें कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से अपनी भावभीनी श्रृद्धांजलि अर्पित की। अपने संबोधन में श्री दयानंद वत्स ने कहा कि आयरिश मूल की मारग्रेट एलिजाबेथ नोबल स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से इतनी प्रभावित हुई कि वे भारत आ गयी ओर फिर कभी स्वदेश नहीं लोटी। भारतीय सभ्यता और संस्कृति में रची बसी एलिजाबेथ को स्वामी विवेकानंद ने अपनी शिष्या बना लिया ओर उन्हें भगिनी निवेदिता नाम दिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पत्नी शारदा ने उन्हें बेटी कहा और मारग्रेट सदा सदा के लिए भारत की बेटी बन गई। उन्होंने स्त्री शिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक ओर प्रेरित किया।

अपनी लिखी अनेकों पुस्तकों में भगिनी. निवेदिता ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति को विश्व में सर्वोपरि माना। एक शिक्षिका और समाज सेविका के रुप में भी उनका योगदान अविस्मरणीय है। कलकत्ता में जब प्लेग फैला उस समय भगिनी निवेदिता ने वहां रहकर प्लेग पीडितों की खूब सेवा की। भगिनी का अर्थ बहन ओर सिस्टर निवेदिता के नाम से वे प्रसिद्ध हुई। भगिनी निवेदिता मानवीय मूल्यों की पक्षधर थीं। वह पश्चिम की प्रथम महिला थीं जिसने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया और भारतीय संस्कृति की ध्वजवाहिका के रुप में कीर्तिमान स्थापित किए।

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