बड़ा सवाल : ब्रांड अंम्बेसडर के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं ?


अशोक कुमार निर्भय
ब्रांड अंम्बेसडर शब्द के बारे में अपने बहुत सुना होगा और कभी कभी इनसे जुड़े विवाद भी चलते रहते है जैसे मैगी, रियल स्टेट आदि में कुछ समस्याएं पाए जाने पर या सवाल भी उठाया गया कि ब्रांड अंम्बेसडर को क्या इस से पहले सोचना नहीं चाहिए जब वो किसी मुख्यत उस ब्रांड के बारे में विज्ञापन करते है। नूडल्स के एक विज्ञापन को लेकर अमिताभ बच्चन और रियल एस्टेट के विज्ञापन को लेकर क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी पर भ्रामक प्रचार के आरोप लगे थे। इसके बाद विभिन्न उत्पादों की गुणवत्ता पर उठे सवाल के बाद ही सरकार सक्रिय हुई। स्थायी समिति ने माना है कि इन जानी-मानी हस्तियों के प्रचार करने का असर बहुत अधिक होता है। गलती करने वाली कंपनियों के साथ ब्रांड एंबेसडर भी दोषी माने जाने चाहिए। इसी के तहत उपभोक्ता संरक्षण कानून को ताकतवर बनाए जाने पर जोर दिया गया। उसके बाद यह भी कि क्या अगर किसी ब्रांड जिसका विज्ञापन कोई कर रहा है तो उसमे कोई खामी पाए जाने पर ब्रांड अंम्बेसडर के खिलाफ भी केस चलाया जाना चाहिए ? ये सब तो विवाद और बहस का मुद्दा है लेकिन हम आज जानते है कि आखिर ये ब्रांड अंम्बेसडर होता है जो कंपनी को खड़ा करता है और उसी गुडविल पर बैंक से लोन ले पाता है। 

 वैसे ब्रांड अंम्बेसडर – “ किसी भी ब्रांड का ब्रांड एम्बेसडर वो होता है जो किसी भी ब्रांड के प्रोडक्ट पब्लिक के सामने सकारात्मक रूप से पेश करें बशर्ते उस प्रोडक्ट के बारे में उसे सही से जानकारी हो | “ और इसके बदले में सम्बन्धित ब्रांड जो है वो उसे तयशुदा रकम देता है । ब्रांड अंम्बेसडर पहले शुरू में भारत में प्रचालन में नहीं था लेकिन जैसे जैसे कम्पनीज के बीच प्रतिस्पर्धा बढती गयी वैसे वैसे कैसे इंडियन लोगो के बीच अपनी जगह बनाई जाये इस बारे में ब्रांड्स सोचने लग। ऐसे में कम्पनीज चाहती थी कि कैसे भी अपने प्रोडक्ट्स को दूसरों से बेहतर जता पायें और ऐसे में ये देखने में आया कि लोग कुछ अभिनेता या खास लोग ऐसे है जिन्हें अपना आदर्श मानते है और ऐसे में उनके जरिये अगर चाहे तो ब्रांड को प्रस्तुत कर लाभ कमाया जा सकता है तो ऐसे इसकी शुरुआत हुई। 2016 में एक प्रस्ताव के अनुसार उपभोक्ता संरक्षण कानून में संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों को शामिल किया जाना था जो अब भी विचाराधीन है। इसके अनुसार उत्पादों का प्रचार करने वाले ब्रांड एंबेसडर भी उत्पाद में गड़बड़ी पाए जाने पर जिम्मेदार होंगे। उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई तक की जा सकती है। अगर यह कानून बना है और या फिर अध्यादेश के माध्यम से लागू है तो गीतांजलि ब्रांड की मुख्य ब्रांड अंम्बेसडर अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के खिलाफ भी केस दायर होना चाहिए ? क्योंकि उन्होंने भी इस कंपनी के फ्राड से बनाये पैसे से अपना भुगतान लिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार स्थायी समिति की सिफारिशों को कानून का हिस्सा बनाने पर सरकार सैद्धांतिक रूप से सहमत है। वह संसद के शीतकालीन सत्र में 30 साल पुराने इस कानून में संशोधन को पारित कराने की तैयारी है। 
कानून के दायरे को जहां व्यापक बनाया जाएगा, वहीं प्रावधानों को सख्त भी किया जाएगा। इस कानून के अनुसार ब्रांड अंम्बेसडर को पांच साल तक की सजा संभव हो सकती है। जानकारी के मुताबिक स्थायी समिति की सिफारिशों के मुताबिक पहली बार दोषी पाये जाने पर किसी भी उत्पाद के ब्रांड एंबेसडर पर दो साल की सजा और 10 लाख रुपये का जुर्माना होगा। जबकि यही गलती दोहराये जाने पर अधिकतम 50 लाख रुपये का जुर्माना और पांच साल की सजा अथवा दोनों हो सकता है। समिति की सिफारिशों को मान लिये जाने के संकेत उपभोक्ता मंत्री राम विलास पासवान ने पहले ही दे दिये थे। इस कानून के बनने के बाद ही विज्ञापन परिषद को मिलेंगे अधिकार गए हैं ऐसा देखने को तो नहीं मिला लेकिन प्रावधान जरूर किया गया था। प्राप्त जानकारी के अनुसार उपभोक्ता संरक्षण कानून के दंत विहीन प्रावधानों को सख्त बनाया जाएगा ऐसा प्रतीत होता है। यह संशोधित विधेयक पिछले साल लोकसभा में पेश किया गया था, जिसे सदन की मांग पर स्थायी समिति को सौंप दिया गया। समिति ने भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) को पर्याप्त अधिकार सौंपने के प्रस्ताव को भी हरी झंडी दे दी है। इससे भ्रामक प्रचार के भरोसे उत्पाद बेचने वालों पर चाबुक लगाया जा सकता है। जानकारी के अनुसार तेजी से बढ़ते ऑनलाइन कारोबार और उसके बारे में मिल रही शिकायतों को भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में शामिल किया जा रहा है। मौजूदा में सबसे अधिक शिकायतें रियल एस्टेट को लेकर है, संशोधित कानून में इसे भी रखा गया है। इसके अलावा उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण का गठन किया जाएगा, जो किसी एक उत्पाद की शिकायत के आधार पर पूरी लॉट पर लागू होगा। बहराल पी एन बी एवं गीतांजलि और नक्षत्र,रोटोमैक आदि ब्रांडों घोटाले के बाद इस कानून की मांग बढ़ती दिखाई दे रही है लेकिन यह सब तो सरकार को तय करना है आम आदमी तो अपने को ठगा सा महसूस कर ही रहा है।

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