डॉ. अम्बेडकर को महापुरुष बनाने वाली महानायिका, रमाबाई अम्बेडकर !

आज भीमराव रामजी आंबेडकर जी का 127वां जन्म दिवस है, बाबा साहेब के नाम से लोकप्रिय, भारतीय विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और महान समाजसुधारक थे। उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और दलितों के ख़िलाफ़ सामाजिक भेद भाव के विरुद्ध एक प्रभावशाली अभियान चलाया। श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया । नौकरी करने वाली महिलाओं को प्रसूति अवकाश दिलाने में उन्होंने बहुत बड़ी वकालत की थी ! इतना ही नहीं, पहली अप्रैल , 1935 को रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया की स्थापना भी उनकी लिखी हुई पुस्तक “The Problem of the Rupee – Its Origin and It’s Solution.” के आधार पर ही की गई थी ! बाबा साहेब भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पकार भी बने और बाद में वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री । डॉ. अम्बेडकर अदभुत प्रतिभा के धनि थे। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान के शोध कार्य में ख्याति प्राप्त की। जीवन के प्रारम्भिक करियर में वह अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे और वकालत भी की। उनका बाद का जीवन राजनीतिक गतिविधियों में ज़्यादा बीता। फ़रवरी 1990 में, उन्हें भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था, जब डॉ. वी पी सिंह देश के प्रधान मंत्री थे । ऐसे महान विद्वान व समाज सुधारक को हमारा लाख – २ प्रणाम , क्योंकि आज पूरा दलित समाज जो भी चेतनता, शिक्षा, सुख सुविधाओं और प्रगति की बुलंदियाँ छू रहा है, वह सब उस महान संघर्ष कर्त्ता की बदौलत ही है ! उनके साथ – २ आज हम चर्चा करेंगे उस महान महिला की , जिसने बाबा साहेब के संघर्ष के दिनों में उनके साथ न केवल अत्यंत ही भीषम प्रस्थितियों का सामना किया बल्कि बाबा साहेब के साथ हमेशा कन्धे से कन्धा मिलाकर चलती रही और उनकी कामयाबी में इस महान महिला का बहुत बड़ा तप – त्याग और सहयोग भी रहा है ! 
प्रत्येक महापुरुष के पीछे उसकी जीवन-संगिनी का बड़ा हाथ होता है। जीवन साथी का त्याग और सहयोग अगर न हो तो व्यक्ति का महापुरुष बनना आसान नहीं है। रमाताई अम्बेडकर इसी त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति थीं, जिसके आधार पर डॉ. अम्बेडकर देश के वंचित तबके का उद्धार कर सकें | रमाबाई का जन्म महाराष्ट्र के दापोली के निकट वणंद गांव में 7 फरवरी, 1898 में हुआ था। इनके पिता का नाम भीकू धूत्रे (वणंदकर) और मां का नाम रुक्मणी था। वह एक रेलवे स्टेशन पर कुलीगिरी का काम करते थे और परिवार का पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से कर पाते थे। रमाबाई के बचपन का नाम रामी था। बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो जाने के कारण रामी और उसके भाई-बहन अपने मामा और चाचा के साथ मुंबई आ गए , जहां वो लोग एक चाल में रहते थे। 12 मार्च , 1906 को उनका विवाह भीमराव अम्बेडकर से हुआ।

डॉ. अम्बेडकर रमा को प्यार से ‘रामू ‘ कहकर पुकारा करते थे, जबकि रमा ताई बाबा साहब को “साहब” कहती थी। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर जब अमेरिका में थे, उस समय रमाबाई ने बहुत कठिन समय व्यतीत किया. बाबासाहेब जब विदेश में थे, तब भारत में रमाबाई को कई प्रकार की आर्थिक दिक्कतों को झेलना पड़ा, लेकिन उनकी कोशिश होती थी की उनकी परेशानियों की भनक डॉक्टर आंबेडकर को न लगे , नहीं तो वह जिस संघर्ष में दिन रात लगे रहते थे, उसमें किसी प्रकार की वाधा आने से वह अक्सर डरती रहती थी । एक समय जब बाबासाहेब पढ़ाई के लिए इंग्लैंड में थे तो धन आभाव के कारण रमाबाई को उपले (पाथियाँ) बेचकर गुजारा करना पड़ा था। लेकिन उन्होंने कभी भी इसकी फिक्र नहीं की और सीमित खर्च में ही जैसे तैसे घर चलाती रहीं।

उनकी गृहस्थी में सन 1924 तक पॉँच बच्चों ने जन्म लिया, लेकिन घर में विभिन्न प्रकार के अभावों वजह से वह अक्सर बिमार पड़ जाती थी , ख़ुद भी वह शारीरक रूप से कमज़ोर थी और उनके बच्चे भी कमज़ोर ही पैदा हुए, बीमार होने पर वह ठंग से इलाज़ भी नहीं करवा पाती थी , जिसकी वजह से उनके चार बच्चे छोटी उम्र में ही मृत्यु को प्राप्त हो गए | किसी भी मां के लिए अपने पुत्रों की मृत्यु देखना सबसे ज्यादा दुख की घड़ी होती है। रमाबाई को यह दुख सहना पड़ा। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर और रमा ताई ने अपने पांच बच्चों में से चार को अपनी आंखों के सामने अभाव में मरते हुए देखा। गंगाधर नाम का पुत्र ढाई साल की अल्पायु में ही चल बसा। इसके बाद रमेश नाम का पुत्र भी नहीं रहा। इंदु नामक एक पुत्री हुई मगर, वह भी बचपन में ही चल बसी थी। सबसे छोटा पुत्र राजरतन भी ज्यादा उम्र नहीं देख पाया। केवल उनके बेटे यशवंत राव जो सबसे बड़े पुत्र थे, वही जिंदा बचे। इन सभी बच्चों ने गरीबी और अभाव में दम तोड़ दिया। जब गंगाधर की मृत्यु हुई तो उसकी मृत देह को ढ़कने के लिए गाँव के लोगों ने नया कपड़ा (कफ़न) लाने को कहा, मगर उनके कफ़न खरीदने के लिए इतने पैसे नहीं थे। तब रमा ताई ने अपनी साड़ी में से ही एक टुकड़ा फाड़ कर दे दिया वही मृत देह को ओढ़ा कर लोग श्मशान घाट ले गए और पार्थिव शरीर को दफ़ना आए थे।

रमा इस बात का ध्यान रखती थी कि पति के काम में कोई बाधा न हो। रमाताई संतोष, सहयोग और सहनशीलता की जीती जागती मूर्ति थी। डॉ. अम्बेडकर प्राय: घर से बाहर रहते थे। वे जो कुछ कमाते थे, उसे वे रमा को सौंप देते और जब आवश्यकता होती, उतना मांग लेते थे। रमाताई घर का खर्च चला कर कुछ पैसा जमा भी करती थी। बाबासाहेब की पक्की नौकरी न होने से उसे काफी दिक्कत होती थी। आमतौर पर कोई भी आम स्त्री अपने पति से जितना वक्त और प्यार चाहती है, रमाबाई को वह डॉ. अम्बेडकर नहीं दे सके, रमा ताई भी भली भाँति जानती थी कि डॉक्टर साहेब अपने समस्त समाज के कल्याण और उनकी समस्याएँ निपटाने में हमेशा जुटे रहते हैं , इसलिए उन्होंने भी अपने पति से कभी शिक़वे शिकायतें नहीं की ! लेकिन उन्होंने बाबासाहेब का पुस्तकों से प्रेम और अपने समाज के उद्धार की दृढ़ता का हमेशा सम्मान किया। वह हमेशा यह ध्यान रखा करती थीं कि उनकी वजह से डॉ. अम्बेडकर को कोई दिक्कत न हो।

डॉ. अम्बेडकर के सामाजिक आंदोलनों में भी रमाताई की सहभागिता बनी रहती थी। दलित समाज के लोग रमाताई को ‘आईसाहेब’ और डॉ. अम्बेडकर को ‘बाबासाहेब’ कह कर पुकारा थे। बाबासाहेब अपने कामों में व्यस्त होते गए और दूसरी ओर रमाताई की तबीयत बिगड़ने लगी। तमाम इलाज के बाद भी वह स्वस्थ नहीं हो सकी और अंतत: 27 मई, 1935 में छोटी उम्र में ही डॉ. अम्बेडकर साहेब का साथ छोड़ इस दुनियाँ से विदा हो गई।

रमाताई के मृत्यु से डॉ. अम्बेडकर को गहरा आघात लगा। उनके साथी बताते हैं कि अपनी पत्नी की मृत्यु पर वे बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोये थे। बाबासाहेब का अपनी पत्नी के साथ अगाध प्रेम था। बाबसाहेब को विश्वविख्यात महापुरुष बनाने में रमाबाई का ही साथ और बहुत बड़ा सहयोग था । बाबासाहेब के जीवन में रमाताई का क्या महत्व था, यह एक पुस्तक में लिखी कुछ लाइनों से पता की जा सकती है। दिसंबर 1940 में बाबासाहेब अम्बेडकर ने “थॉट्स ऑफ पाकिस्तान” नाम की पुस्तक को अपनी पत्नी रमाबाई को ही भेंट किया। भेंट के शब्द इस प्रकार थे.. “रमो को उसके मन की सात्विकता, मानसिक सदवृत्ति, सदाचार की पवित्रता और मेरे साथ दुःख झेलने में, अभाव व परेशानी के दिनों में जब कि हमारा कोई सहायक न था, मैं उनकी असीम सहनशीलता और सहमति दिखाने की प्रशंसा स्वरुप भेंट करता हूं…..…”

डॉ. अम्बेडकर द्वारा लिखे गए इन शब्दों से स्पष्ट है कि माता रमाबाई ने बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर का किस प्रकार संकटों के दिनों में साथ दिया और बाबासाहेब के दिल में उनके लिए कितना सत्कार और प्रेम था। हमारे देश का समस्त दलित समाज इस महान महिला को नमन करता है और सदैव उनका ऋणी रहेगा ।

आर.डी. भारद्वाज “नूरपुरी “

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