आज भी हिंदी फिल्म प्रेमियों के दिलों पर राज करते हैं वीरू यानि धर्मेन्द्र


(लेख: एस.एस.डोगरा

Email:ssdogra@journalist.com)

“धर्म,” “गर्म धर्म,” भारतीय सिने जगत के “ही-मैन” ने हर किरदार में दर्शकों का दिल जीता. इसी का जीता जागता उदहारण है उन पर फिल्माए गए निम्न गीत जो आज भी कहीं देखने सुनने को मिल जाते हैं तो बस दिल गा उठता है.:

“पल पल दिल के पास, तुम रहती हो, जीवन मीठी प्यास, ये कहती हो”

“आपके हसीन रुख़ पे आज नया नूर है, मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या क़ुसूर है”
“ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोडेंगे”

“हुई शाम उनका ख्याल आ गया, वही जिन्दगी का सवाल आ गया”

“आप की निगाह ने कहा तो कुछ ज़ुरूर है, मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या क़ुसूर है”

“किसी शायर की गजल, ड्रीम गर्ल, कहीं तो मिलेगी, कभी तो मिलेगी, आज नहीं तो कल, ड्रीम गर्ल”

लेकिन इन अपार सफलताओं तक पहुँचने के लिए पंजाब दे पुत्तर यानि धर्मेन्द्र साहेब ने जीवन के कई पहलुओं का सामना भी किया.

बचपन और जवानी:

धर्मेन्द्र का जन्म, 8 दिसम्बर 1935 को साहनेवाल, तहसील-खन्ना, जिला: लुधियाना, पंजाब में केवल किशन सिंह देओल (सरकारी स्कूल शिक्षक) एवं माता – सतवंत कौर के सिख परिवार में हुआ. इंटरमीडिएट आर.जी. (रामगढ़िया) कॉलेज फगवाड़ा, पंजाब से की. मात्र 19 वर्ष आयु में प्रकाश कौर से धर्मेन्द्र की पहली शादी हो गई थी.

फिल्मों की ओर आकर्षण:

धर्मेन्द्र के अनुसार उन्होंने पहली फिल्म अपने गांव से मीलों दूर एक सिनेमाघर में सुरैया की फिल्म ‘दिल्लगी’ देखी और इससे वे इतने प्रभावित हुए कि अपना करियर उन्होंने फिल्मों में बनाने का निश्चय कर लिया था. धर्मेन्द्र ने कही से भी अभिनय की कोई ट्रेनिंग नहीं ली, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अनेक प्रतिभाशाली लोगों को पीछे छोड़ते हुए सरीखे कलाकारों से आगे बढ़ने पर ध्यान केन्द्रित किया और उन्हें सफलता भी मिली.

फ़िल्मी सफ़र:

धर्म पाजी ने सन 1960 में हिंदी सिनेमा अपनी पहली फिल्म अर्जुन हिंगोरानी की ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से की थी। हालाँकि धर्मेन्द्र का कद-काठी पहलवानों जैसी थी, इसीलिए कई निर्माताओं ने उन्हें अभिनय छोड़ अखाड़े में किस्मत आजमाने की सलाह दी। उन्होंने 1960 के दशक में कई रोमाटिक फ़िल्मों में काम कर अपनी मजबूत पहचान बना डाली। लेकिन सन 1966 में “फूल और पत्थर” धर्मेन्द्र के फ़िल्मी सफ़र की पहली बड़ी हिट फिल्म साबित हुई. जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ हीरो के फ़िल्म फेयर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। अपने कैरियर की शुरुआत में उन्होंने कई प्रमुख अभिनेत्रियों के साथ अभिनय किया। जिनमें नूतन के साथ ‘सूरत और सीरत’ (1962) और ‘बंदिनी’ (1963) फ़िल्म ‘अनपढ़’ और 1964 में आई फ़िल्म ‘पूजा के फूल’ में माला सिन्हा के साथ 1962 की फ़िल्म ‘शादी’ और 1964 में ‘आई मिलन की बेला’ में सायरा बानो के साथ सफलतापूर्वक काम किया और अच्छी खासी शोहरत भी कमाई। हिंदी फ़िल्म ‘आंखे’ में जब उन्हें दर्शकों ने एक शेर से सच में लड़ते देखा तो सभी आश्चर्य चकित हो गए और वे उसी दिन से शेरों का शेर धर्मेद्र नाम से प्रसिद्ध हो गए । धर्मेद्र को भारत सरकार ने 2012 पद्म भूषण से भारत की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने पुरुस्कृत किया। इससे पहले उन्हें 1991 में “घायल” के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्माता के तौर पर राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार तथा वर्ष 1997 में लाइफ़टाइम अचीवमेंट से नवाजा गया.

रोमांस एवं शोहरत:

यह भी कहा जाता है कि फूल और पत्थर की शूटिंग के दौरान फिल्म अभिनेत्री मीना कुमारी से उनकी नजदीकियां बढ़ने लगी थी, मीना कुमारी के सानिध्य ही में उन्हें शायरी का शौक भी लगा धर्मेन्द्र और मीना कुमारी की नजदीकियों से मीना के पति कमाल अमरोही को गवारा नहीं था. वर्षों बाद उन्होंने धर्मेन्द्र को लेकर ‘रजिया सुल्तान’ बनाई और अपनी भड़ास निकालते हुए एक दृश्य में उन्होंने धर्मेन्द्र का मुंह तक काला करवा दिया। हिंदी फिल्म इतिहास में धर्मेन्द्र एक सुन्दर हीरो माने जाते हैं उनकी सेहत और चेहरे की चमक देख महान अभिनेता दिलीप कुमार ने भी एक बार यहाँ तक कह डाला था कि वे अगले जन्म में धर्मेन्द्र जैसी शख्सियत पाना चाहते हैं। इसी फ़िल्मी सफ़र में, धर्मेन्द्र को सबसे ज्यादा लोकप्रियता “सत्यकाम” और “शोले” में अभिनय करने के बाद मिली. सन 1975 में रमेश सिप्पी निर्देशित फ़िल्म ‘शोले’ ने धर्मेंद्र को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाई। इस फ़िल्म के बाद धर्मेंद्र की गिनती विश्व के 25 बेजोड़ अभिनेताओं में होने लगी। अपने कैरियर में धर्मेन्द्र ने हर किस्म के रोल किए। रोल चाहे फ़िल्म सत्यकाम के सीधे-सादे ईमानदार हीरो की भूमिका रही हो, फ़िल्म शोले के एक्शन हीरो का हो या फिर फ़िल्म चुपके-चुपके फिल्म में कॉमेडियन हीरो का, सभी को बखूबी निभाकर दिखा देने वाले धर्मेंद्र ने करोड़ों दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बना डाली।

हेमा मालिनी के साथ उनका प्रेम-प्रसंग “शोले” फिल्म के दौरान जागृत हुआ और विवाह के किस्से तो आज भी बॉलिवुड के सबसे हसीन लव स्टोरी में गिने जाते हैं। धर्मेन्द्र ने हेमा से शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन किया और इस्लाम अपनाया। 2 मई, 1980 को जब धर्मेद्र ने हेमा मालिनी के साथ सात फेरे लिए, तब तक दोनों एक साथ एक दर्जन से भी अधिक फ़िल्मों में काम कर चुके थे। धर्मेन्द्र ने अपने लंबे करियर में तमाम दिग्गज निर्देशकों बिमल रॉय, ऋषिकेश मुखर्जी, यश चोपड़ा, बीआर चोपड़ा, रमेश सिप्पी, मनमोहन देसाई के साथ काम किया। अभिनेता से नेता बनने का मजा भी धर्मेन्द्र ने बखूबी लिया जब वे बीकानेर, राजस्थान से 14वीं लोकसभा वर्ष 2004-2009 तक भारतीय जनता पार्टी के लिए बतौर सांसद भी रहे. आज भी हिंदी फिल्म प्रेमियों के दिलों पर राज करते हैं शोले के वीरू यानि धर्मेन्द्र.

Leave a Reply