समाज की एक ऐसी स्थिति, जिसे है सुधार की दरकार

कड़ाके की ठंड का मौसम था । चारों ओर कुहासे ही कुहासे छाए हुए थे। सुबह के करीब 6 बज रहे होंगे जब मैं अपने घर से बाहर निकल रहा था। मेरी नज़र मेरे पड़ोस के घर के बाहर खड़े चार बच्चों पर पड़ी। उतने कड़ाके की ठंड में न उनके पैरों में चप्पल थे और न ही शरीर पर कोई ठंड को बेअसर करने वाला अच्छा सा कपड़ा । बस वे लोग हल्ले फुल्के से बेजान स्वेटर पहने हुए थे। उन सबके हाथों में एक – एक थैला था। उनकी उम्र 6 साल से लेकर 12 साल के बीच की होगी और वे लोगों के घर-घर जाकर भिक्षा मांग रहे थे। इस प्रकार का दृश्य मैंने पहले कभी भी नहीं देखा था।इस दृश्य ने मुझे वाकई में झकझोर कर रख दिया। अब मुझसे रहा नहीं गया और मैं सीधे उन बच्चों के पास जा पहुंचा। पास जाकर उनकी हालात देखकर मैं और भी चिंतित हो गया। मैं अपने मन ही मन में सोच रहा था कि आखिरकार ये लोग इतने ठंड में और इस हालात में लोगों के घर-घर जाकर भिक्षा मांगने को क्यों मजबूर हैं? क्या इनके माता-पिता इनके लिए दो जून की रोटी का भी इंतजाम नहीं कर सकते ? जिस उम्र में हमारे समाज में आमतौर पर हरेक बच्चा का समय होता है पढ़ने, लिखने और खेलने का, उस उम्र में ये बच्चें भीख मांग कर अपना पेट भरने को मजबूर हैं, आखिर क्यों? मेरे मन में न जाने और भी कितने इस तरह के सवाल उन बच्चों को देखकर उठ रहे थे। जिसका जवाब मेरे पास तो नहीं था इसलिए मैं सीधे ही उन बच्चों से बातचीत करना शुरू कर दिया। सबसे पहले मैंने उन सबका नाम पुछा। शुरू- शुरू में तो वे अपना नाम बताने पर भी हिचकिचा रहे थे लेकिन जब मैं उनके साथ बातचीत करने में घुल-मिल गया तो वे अपना नाम ही नहीं बताए मुझे बल्कि और भी बहुत ही सारे ऐसे जानकारी दे दिए जो मेरे मन में उठ रहे सवालों के जवाब थे। जब मैंने उन चारों बच्चों में से एक से पुछा कि क्या तुम्हें इस उम्र में पढ़ने का मन नहीं करता है? तब उन चारों बच्चों ने एक साथ मिलकर जवाब दिया कि हां, करता है लेकिन हमारे मम्मी-पापा हमे पढ़ने के लिए स्कुल नहीं जाने देते हैं। मैंने पूछा क्यों? क्यों आप लोगों के माता-पिता पढ़ने के लिए विद्यालय नहीं जाने देते हैं? मेरे इस प्रश्न पर उन बच्चों का जो उत्तर था वो वाकई में मुझे हैरान कर देने वाला था। मेरे सवाल का जवाब देते हुए उन बच्चों ने कहा कि हम जब भी मम्मी-पापा से कहते हैं कि हमें पढ़ने के लिए विद्यालय जाना है तो वो बोलते हैं कि स्कुल जाकर तुमलोग क्या करोगे? नहीं जाना स्कुल। चलों चुपचाप जाओं और गांव में से कुछ खाने के लिए मांग कर लाओं। अब मैं कुछ और पूछता ही कि तब तक वे बच्चें फिर बोल उठते हैं कि अगर हमलोग सुबह-सुबह उठकर गांव में कुछ खाने के लिए मांगने नहीं जाएं या फिर सुबह उठने में थोड़ी सी भी देर हो जाए तो मम्मी-पापा हमें खाने के लिए खाना नहीं देते हैं और मारने भी लगते हैं। इतना कहकर वे बच्चें जाने लगते हैं। शायद इसीलिए कि उन्हें और भी घरों से कुछ खाने का इंतजाम करके समय पर अपने घर को भी लौटना होगा। हमारे इस समाज में इस प्रकार के स्थिति को देखकर मैं दंग रह गया। पता नहीं इनके जैसे और भी कितने बच्चें होंगे इस देश में, जिनके साथ इस तरह की परिस्थिति होगी? पर सवाल है कि आखिरकार क्यों?

पहले हम तो सरकार को भी कोसते थे कि सरकार अच्छे से समाज को सुदृढ़ करने के लिए व्यवस्था करने में असफल है। लेकिन अब तो वो पहले वाली स्थिति भी नहीं है। हमारे देश के सरकारी स्कूलों में प्रारंभिक शिक्षा के लिए निशुल्क व्यवस्था है। लेकिन फिर भी कुछ लोगों की ऐसी स्थिति है कि अपने बच्चों को पढ़ाई कराने के उम्र में उनसे भिक्षा मांगवाते है! बच्चों के हाथों में उनके भविष्य को एक सही राह दिखाने वाले कलम को पकड़वाने के बजाय लोग उन बच्चों के हाथों में भीख का कटोरा थमा देते हैं! इस स्थिति को सुधारने की आवश्यकता है। उन माता-पिता को यह समझना होगा कि जिस भी कारण से आज वो इस प्रकार की जिंदगी जीने को मजबूर हैं कम से कम उनके बच्चें तो इस तरह की जिंदगी को न जीएं। वे अपने बच्चों को इस तरह के दलदल में न धकेले और उन्हें खुलकर अपने जिंदगी को जीने का मौका दें।

नाम :- अमित कुमार दुबे
छात्र:- पत्रकारिता, अंतिम वर्ष
कॉलेज:- फेयरफिल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली।