राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस पर विशेषज्ञों ने जैविक घड़ी, आंत के स्वास्थ्य और प्रमाण-आधारित आयुर्वेद पर दिया जोर

आरजेएस पीबीएच -आरजेएस पॉजिटिव मीडिया द्वारा 11वें राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के उपलक्ष्य में स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद विषय पर  संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना द्वारा संचालित राष्ट्रीय वेबिनार में प्रमुख संस्थानों के चिकित्सकों ने बिना चिकित्सकीय परामर्श के दवाएं लेने के खतरों से आगाह किया और पाचन तंत्र की विकृतियों से होने वाले गंभीर शारीरिक रोगों की प्रक्रिया को स्पष्ट किया।

मुख्य वक्ता  बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के आयुर्वेद संकाय के पूर्व संकाय सदस्य डॉ. यामिनी भूषण त्रिपाठी ने आयरलैंड यूके से आभासी बैठक में पारंपरिक आयुर्वेदिक सिद्धांतों को आधुनिक जीव विज्ञान की कसौटी पर प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 1948 में स्वास्थ्य को केवल बीमारी की अनुपस्थिति नहीं बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की स्थिति बताया था, जबकि आयुर्वेद ने हजारों वर्ष पूर्व इसमें आध्यात्मिक सुख और इंद्रियों की प्रसन्नता को भी समाहित किया था। दोष, अग्नि और धातु का संतुलन तथा आत्मा, इंद्रियों और मन की प्रसन्नता ही वास्तविक स्वास्थ्य है।

डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों को लगातार प्रमाणित कर रहे हैं। जीवनशैली की विसंगतियों को उन्होंने तीन कारकों के रूप में रेखांकित किया, जिसमें लगातार जल्दबाजी, मानसिक चिंता और अत्यधिक तला-भुना या जंक फूड शामिल हैं।

जैविक घड़ी के महत्व को रेखांकित करते हुए डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि शरीर की आंतरिक प्रणालियां वात, पित्त और कफ के चार-चार घंटे के चक्र में कार्य करती हैं। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित चौधरी ब्रह्मप्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान, दिल्ली सरकार के निदेशक-प्रिंसिपल प्रो. डॉ. एम.बी. गौड़ ने सरकारी और नीतिगत प्रयासों पर प्रकाश डाला। प्रो. गौड़ ने कहा कि केंद्रीय आयुष मंत्रालय आयुर्वेद को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों, अनुसंधान और नवाचार के साथ वैश्विक स्तर पर मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। 

प्रो. गौड़ ने फ्रिज में रखे बासी, अत्यधिक मसालेदार और तामसिक भोजन के खतरों के प्रति आगाह करते हुए कहा कि प्राचीन ग्रंथों में ऐसे आहार को दुख और शोक उत्पन्न करने वाला बताया गया है। अतिथि वक्ता चौधरी ब्रह्मप्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान के स्वस्थवृत्त एवं योग विभाग की एमडी शोधार्थी डॉ. गुंजन मेहरा ने भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद, राष्ट्रीय पोषण संस्थान और विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि गैर-संचारी रोगों से होने वाली अधिकांश मौतों का मुख्य कारण बिगड़ती जीवनशैली है।

डॉ. मेहरा ने आहार विधि विशेष आयतन के नियम समझाते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी खाद्य पदार्थ का प्रभाव उसकी प्रकृति, पकाने की विधि, मात्रा, देश, काल और खाने वाले की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। उन्होंने खाली पेट ताजे फल खाने से बचने की सलाह दी, क्योंकि इससे रक्त में शर्करा का स्तर अचानक बढ़ सकता है। फल दिन के समय हल्के भोजन के बाद ही खाने चाहिए।

आयुर्वेदिक औषधियों को लेकर प्रचलित भ्रांतियों को दूर करते हुए डॉ. मेहरा ने कहा कि यह सोचना गलत है कि देसी दवाओं के दुष्प्रभाव नहीं होते। सत्र के दौरान आयोजित विस्तृत प्रश्नोत्तर काल में प्रतिभागियों ने कोविड उपरांत स्वास्थ्य, आंत-मस्तिष्क संबंध और व्यावहारिक समस्याओं पर सवाल रखे।

दीप माथुर,उदय शंकर सिंह कुशवाहा, बिंदा मन्ना ,स्वीटी पॉल, राजेंद्र सिंह कुशवाहा, डा.रश्मि चौबे, इशहाक खान,नीति अरोड़ा, डॉ रश्मि चौबे, डॉ राहुल सिंह ,विक्की शर्मा, शिवम ,नीरज जोशी ,डॉ उन्नीकृष्णन एस ,डा.बामदेव त्रिपाठी(सिंगापुर)राजबाला, आकांक्षा ,डा. अनुष्का, रोहन, मयंकराज, दिनेश माथुर, दीपिका डागर ,प्रकृति कुमारी, वंदना ,डॉ अनुराग सिंह, भोलाराम धाकड़ और चंद्रप्रकाश आदि कार्यक्रम में शामिल हुए।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के उदय मन्ना ने बताया कि यह संगोष्ठी आजादी का अमृत महोत्सव श्रृंखला के तहत आयोजित की गई। उन्होंने भगवान धनवंतरी, महर्षि चरक और महर्षि सुश्रुत के ऐतिहासिक अवदान को नमन किया। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती का स्मरण करते हुए मन्ना ने आगामी सामाजिक पहलों की जानकारी दी, जिसमें भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी के साथ मिलकर आयोजित किया जाने वाला स्वैच्छिक रक्तदान शिविर भी शामिल है।