राम जानकी संस्थान (RJS) पॉजिटिव मीडिया के संस्थापक उदय कुमार मन्ना द्वारा जैव मंडल (बायोस्फीयर) को समझने के लिए आयोजित 516वें राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रमुख वैज्ञानिकों, और पर्यावरणविदों ने कहा कि भारत वर्तमान में दुनिया की लगभग 18% आबादी का बोझ उठा रहा है, जबकि उसके पास दुनिया के ताजे पानी के संसाधनों का केवल 4% हिस्सा है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि “प्रकृति के साथ संघर्ष” की वर्तमान जीवनशैली को बदलकर “प्रकृति के साथ सामंजस्य” नहीं बिठाया गया, तो देश अपनी जीवन रक्षक प्रणालियों के आसन्न पतन का सामना कर सकता है।
कार्यक्रम के सह-आयोजक अरावली जैव-विविधता पार्क (DDA) के वैज्ञानिक और फील्ड बायोलॉजिस्ट डॉ. दिनेश अल्बर्टसन ने भारत के संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बारे में चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि देश में अब 31 करोड़ (310 मिलियन) वाहन हैं और रोजाना लाखों लीटर औद्योगिक कचरा (एफ्लुएंट) हमारी जल प्रणालियों में सीधे छोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि अकेले दिल्ली में औद्योगिक कचरे के बहाव का पैमाना इतना अधिक है कि यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बीमार कर रहा है।
डॉ. अलबरसन ने “विषम आवश्यकता” (asymmetric necessity) की वैज्ञानिक अवधारणा पेश की। उन्होंने स्पष्ट किया, “हमें यह महसूस करना चाहिए कि यदि मनुष्य आज पृथ्वी से गायब हो जाएं, तो अधिकांश पौधे, सूक्ष्मजीव और कवक फलते-फूलते रहेंगे। लेकिन, मनुष्य इन सूक्ष्मजीवों के बिना जीवित नहीं रह सकता। जैव-विविधता का नुकसान सीधे तौर पर नई बीमारियों और पूर्ण पारिस्थितिक पतन का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।” उन्होंने जोर दिया कि हालांकि मनुष्य एक नया जैव-मंडल ‘बना’ नहीं सकते, लेकिन उनमें नष्ट हो चुकी जमीनों को फिर से जंगलों में बदलने की शक्ति है।मणिपुर की पेबम शकुंतला देवी ने धन्यवाद प्रस्ताव पेश करते हुए “जियो और जीने दो” के दर्शन पर जोर दिया। उन्होंने “मीडिया साक्षरता” का आह्वान किया ताकि नागरिक केवल नकारात्मकता के बजाय सकारात्मक और समाधान-आधारित समाचारों को प्राथमिकता दें।
मुख्य अतिथि और भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पूर्व सलाहकार डॉ. जी.वी. सुब्रमण्यम ने भारत के संरक्षण प्रयासों को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रखा। उन्होंने यूनेस्को के “मैन एंड बायोस्फीयर” (MAB) कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताया, जो 1971 में मनुष्य और पर्यावरण के बीच संबंधों का अध्ययन करने के लिए शुरू किया गया था। भारत की इसमें औपचारिक भागीदारी 1986 में नीलगिरी बायोस्फीयर रिजर्व की स्थापना के साथ शुरू हुई थी। आज, भारत में 18 ऐसे रिजर्व हैं जो 90,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं।
पर्यावरणविद् आर.के. बिश्नोई ने आधुनिक विज्ञान और प्राचीन ज्ञान के बीच की कड़ी के रूप में “पंचमहाभूत” (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) की अवधारणा को रखा। बिश्नोई समुदाय की गौरवशाली विरासत—जिसने पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी—का जिक्र करते हुए उन्होंने आधुनिक समाज की आलोचना की, जो प्राकृतिक आवरण को हटाकर पृथ्वी को “नग्न” कर रहा है।





