प्रवासी भारतीय दिवस पर प्रवासियों के योगदान पर चर्चा

भारतीय प्रवासी समुदाय अब केवल प्रेषण (रेमिटेंस) का स्रोत नहीं रह गया है, बल्कि वह भारत के ‘विकसित भारत’ लक्ष्य के लिए 100 अरब डॉलर की एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति बन चुका है। यह खुलासा राम जानकी संस्थान (आरजेएस) पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस (पीबीएच) के 514वें अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के दौरान किया गया। कार्यक्रम के सह-आयोजक भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर), विदेश मंत्रालय के कार्यक्रम निदेशक सुनील कुमार सिंह ने डेटा के माध्यम से बताया कि कैसे 3.5 करोड़ से अधिक प्रवासियों का यह वैश्विक समुदाय भारत के विदेशी मुद्रा भंडार और राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन प्रयासों का मुख्य आधार बन गया है।3.5 करोड़ से अधिक भारतीय प्रवासी समुदाय भारत के विदेशी मुद्रा भंडार (FDI, रेमिटेंस) और गरीबी उन्मूलन में महत्वपूर्ण योगदान देता है, क्योंकि वे अपने भेजे पैसों (Remittances) से परिवारों का भरण-पोषण करते हैं, निवेश करते हैं, और भारत की आर्थिक स्थिति मजबूत करते हैं, जिससे आय का एक बड़ा स्रोत बनता है और ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में गरीबी कम होती है, साथ ही कौशल और ज्ञान का हस्तांतरण भी होता है, जो भारत के समग्र विकास के लिए अहम है।

“ग्लोबल नेटवर्किंग फॉर पॉजिटिव चेंज” विषय पर आधारित इस कार्यक्रम ने भारत के विकासात्मक लक्ष्यों और इसके विदेशी नागरिकों के संसाधनों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में कार्य किया। आरजेएस पीबीएच के राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने सत्र की शुरुआत करते हुए कहा कि सकारात्मक मीडिया आंदोलन अब अपने 11वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के तहत प्रवासियों के योगदान को ‘ग्रंथों’ (पुस्तकों) के माध्यम से प्रलेखित किया जा रहा है, ताकि प्रवासियों के प्रयासों का एक स्थायी ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाया जा सके।

अमृत काल का सकारात्मक भारत -उदय के पांच सौ पार कार्यक्रम में सुनील कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) को अब केवल विदेशों में काम करने वाले श्रमिकों के रूप में नहीं, बल्कि “रणनीतिक सहयोगियों” और “सांस्कृतिक राजदूतों” के रूप में देखा जाता है। उन्होंने जानकारी दी कि आईसीसीआर इन संबंधों को मजबूत करने के लिए दुनिया भर में 38 सांस्कृतिक केंद्र संचालित करता है। सुनील कुमार सिंह ने कहा, “हमारा प्रवासी समाज वैश्विक सरकारों और वैज्ञानिक समुदायों में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति के माध्यम से भारत की विदेश नीति और राजनयिक संबंधों को सशक्त बनाता है।” उन्होंने जनवरी 2025 में भुवनेश्वर में आयोजित होने वाले 18वें प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन का भी उल्लेख किया, जिसका विषय “विकसित भारत में प्रवासियों का योगदान” था।

वेबिनार में आर्थिक चर्चा के साथ-साथ प्रवासी अनुभव के “मानवीय पक्ष” पर भी गहन विमर्श हुआ। ‘इंस्पायरिंग इंडियन वुमन’ (यूके और इंडिया) की संस्थापक निदेशक रश्मि मिश्रा ने प्रवासियों के सामने आने वाली सामाजिक चुनौतियों पर भावुक संबोधन दिया। उन्होंने भारत में पीछे रह गए बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल और सुरक्षा की समस्या को रेखांकित किया। मिश्रा ने कहा, “भारत में रहने वाले माता-पिता की सुरक्षा और स्वास्थ्य विदेशों में रहने वाले बच्चों के लिए चिंता का निरंतर स्रोत है।” इसके अलावा, उन्होंने संपत्तियों पर अवैध कब्जे की चिंता जताते हुए प्रवासियों की पैतृक भूमि की सुरक्षा के लिए बेहतर संस्थागत ढांचे की मांग की। रश्मि मिश्रा ने ‘सर्कुलर माइग्रेशन’ (स्वदेश वापसी) के महत्व पर भी जोर दिया।

वेबिनार में यह भी उभर कर आया कि विदेश में रहने से अक्सर व्यक्ति का भारतीय संस्कृति के प्रति जुड़ाव और गहरा हो जाता है। जर्मनी के बर्लिन से जुड़ीं प्रसिद्ध वैज्ञानिक और कवयित्री डॉ. योजना शाह जैन ने तर्क दिया कि प्रवासी समुदाय भारतीय परंपराओं का सच्चा संरक्षक है। “दूरी हमें अपनी जड़ों की असली कीमत समझाती है,” डॉ. जैन ने कहा। उन्होंने बताया कि जर्मनी में भी महिलाएं साड़ियाँ पहनती हैं और भारतीय त्योहार मनाती हैं। उन्होंने तुलसीदास, सूरदास और प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों के माध्यम से भाषाई पहचान बनाए रखने पर जोर दिया, हालांकि उन्होंने भारतीय राजनयिक मिशनों को प्रवासियों के साथ औपचारिक प्रोटोकॉल से आगे बढ़कर सक्रिय रूप से जुड़ने की सलाह दी।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण साझा करते हुए ऑस्ट्रेलिया की लेखिका और शोधकर्ता डॉ. श्वेता गोयल ने कहा कि वैश्विक नेटवर्किंग की सफलता “आंतरिक नेटवर्किंग” यानी आध्यात्मिक अभ्यास के माध्यम से मानसिक स्पष्टता बनाए रखने पर निर्भर करती है। उन्होंने भगवद गीता को आधुनिक पेशेवरों के लिए “माइंड मैनेजमेंट” (मानसिक प्रबंधन) के साधन के रूप में प्रस्तुत किया। डॉ. गोयल ने कहा, “गीता अर्जुन को युद्ध के मैदान में दी गई थी, न कि किसी जंगल में; यह सक्रिय और आधुनिक जीवन के लिए एक मार्गदर्शिका है।” उन्होंने प्रवासियों से इस ज्ञान को अपने प्राथमिक सांस्कृतिक निर्यात के रूप में ले जाने का आह्वान किया।

कार्यक्रम की मॉडरेटर और पूर्व स्काई न्यूज यूके पत्रकार याशिका मित्तल,जो दिल्ली डायरी न्यूज़ की प्रतिनिधि हैं ने इंग्लैंड से भारत लौटने के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने गौर किया कि पश्चिमी देशों की कार्य प्रणाली कुशल तो है, लेकिन उनमें वह भावनात्मक “अतिरिक्त हृदय” नहीं है जो भारतीय पेशेवर जीवन में मिलता है। उन्होंने स्वीकार किया कि इस वेबिनार ने प्रवासियों के प्रति उनके नजरिए को बदल दिया है और अब वह उन्हें भारतीय पहचान के मजबूत स्तंभ के रूप में देखती हैं।

आरजेएस आंदोलन ने भविष्य की ओर देखते हुए “सतत विकास के लिए युवा मस्तिष्क को सशक्त बनाना” विषय पर एक प्रमुख पहल किया है देवास मध्य प्रदेश के कमल मालवीय ने। 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस पर केंद्रित इस अभियान का उद्देश्य युवाओं में ‘जोश’ के साथ ‘होश’ का समन्वय करना है। देवास, मध्य प्रदेश के भजन गायक कमल मालवीय ने इस पहल में युवाओं को जोड़ने का आह्वान किया, जिसे गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी , संस्थापक जियो गीता और गुजरात के व्यास मुनि जी जैसे आध्यात्मिक गुरुओं का समर्थन प्राप्त है।

पर्यावरण के क्षेत्र में “सकारात्मक भारत” की भूमिका पर अरावली बायोडायवर्सिटी पार्क के फील्ड बायोलॉजिस्ट डॉ. दिनेश अल्बर्टसन ने विचार रखे। उन्होंने प्रवासियों से पर्यावरण की रक्षा करने वाले स्टार्टअप में निवेश करने का आग्रह किया। डॉ. दिनेश अल्बर्टसन ने कहा कि पारिस्थितिक स्वास्थ्य राष्ट्रीय समृद्धि का अभिन्न अंग है।

वेबिनार को लोक गायक दयाराम मालवीय के सांस्कृतिक योगदान ने और समृद्ध किया, जिन्होंने प्रवासियों की तुलना उन “मोतियों” से की जो समुद्र पार भारत का प्रकाश फैला रहे हैं। व्यावसायिक सलाहकार राकेश मनचंदा ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए 110 साल पहले महात्मा गांधी की दक्षिण अफ्रीका से वापसी का उल्लेख किया और कहा कि भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए प्रवासियों को करुणा और आपसी सम्मान जैसे सार्वभौमिक मूल्यों का नेतृत्व करना होगा।

तकनीकी और संगठनात्मक मोर्चे पर, ‘नेक्स्ट जेन मीडिया’ के निदेशक अनिल कुमार मौर्य ने आरजेएस पीबीएस के आगामी कार्यक्रमों के लिए पेशेवर फिल्मांकन और सहायता प्रदान करने का संकल्प लिया। डॉ. कविता परिहार, रति चौबे और जगदीश मालवीय सहित अन्य वक्ताओं ने ‘अतिथि देवो भव’ की भावना को दोहराते हुए कहा कि आरजेएस नेटवर्क एक “वैश्विक परिवार” की तरह कार्य कर रहा है।

तीन घंटे के इस मैराथन सत्र के समापन पर, उदय कुमार मन्ना ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरा विश्व एक परिवार है) के संकल्प को पुनर्जीवित किया। उन्होंने 17 जनवरी को अपने जन्मदिन के अवसर पर एक “बड़े संकल्प” की घोषणा की, जिसे वह सकारात्मक आंदोलन के प्रति नवीनीकृत प्रतिबद्धता के दिन के रूप में मनाना चाहते हैं। श्री मन्ना ने जोर दिया कि मीडिया साक्षरता और सांस्कृतिक नेटवर्किंग के माध्यम से “सकारात्मक भारत” का यह कारवां 2047 के शताब्दी वर्ष की ओर निरंतर बढ़ता रहेगा। यह वेबिनार प्रेषण के साथ-साथ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव के माध्यम से विकसित भारत के निर्माण में प्रवासियों की भूमिका का एक ऐतिहासिक दस्तावेज सिद्ध हुआ।