होली का यथार्थ समझो !

होली का इतिहास अच्छी तरह जानने और समझने के लिए पहले हमें सितंबर 2020 में उत्तर प्रदेश के एक जिले हाथरस में हुई एक दर्दनाक और शर्मनाक घटना को थोड़ा गंभीरता से खंगालना पड़ेगा ! हाथरस के एक गाँव में एक गरीब दलित परिवार की बीस वर्ष की लड़की पशुओं के लिए चारा काटने खेतों में गई , वहां उसे अगड़ी जातियों के चार दबंगों ने पकड़ लिया और उसके साथ समूहिक बलात्कार किया! लड़की के माँ बाप को इसकी सूचना मिलने पर वह उसे अपने किसी नज़दीक के अस्पताल में इलाज के लिए लेकर गए, लेकिन लड़की की हालत इतनी ख़राब हो चुकी थी कि वहां के डॉक्टरों ने उसे अलीगढ़ के मेडिकल कॉलेज रेफ़र कर दिया ! वहां उसके समूहिक बलात्कार की पुष्टि हो गई और लड़की ने अपने साथ हैवानियत करने वाले चारों लड़कों के नाम भी बता दिए, लड़की के ब्यान के आधार सभी लड़कों पर गैंगरेप का मुकदमा दर्ज करवाया गया! लड़की को आगे के इलाज के लिए अलीगढ़ से 28 सितंबर को दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल ले जाया गया, दुर्भाग्य से दिल्ली आने के अगले ही दिन उसकी मृत्यु हो गई. बलात्कारी अमीर और अगड़ी जातियों के दबंग परिवारों के बिगड़े हुए लड़के थे, उन्होंने अपनी दौलत और राजनैतिक रसूख के बलबूते पर लड़की की बॉडी घर वालों को सौंपने के बजाये पुलिस के हवाले करवा दिया और पुलिस वालों ने राजनैतिक दबाव में आधी रात को ही खेतों में लड़की की बॉडी को जला दिया ! लड़की के समाज वालों ने पुलिस और प्रसाशन की मिली भगत पर हंगामा तो बहुत किया, लेकिन नतीजा कुछ ख़ास नहीं निकला ! कोर्ट केस तो अभी भी चल रहा होगा लेकिन लड़की के परिवार को इंसाफ़ मिलने की संभावना बहुत कम है !

पौराणिक कथा कहानियों में बताई गई मौजूदा रूप की पृष्ठभूमि में मनाये जाने वाले त्यौहार होली का इतिहास भी कुछ ऐसा ही है ! उत्तर प्रदेश के ही जिले लखनऊ के पास वाले हरदोई की घटना है यह, आज से तकरीबन पांच हज़ार तीन सौ वर्ष पहले हरदोई का एक मूलनिवासी राजा हुआ करता था, जिसका नाम था हिरणाक्ष , उसके घर में उसका एक छोटा भाई हिरण्यकश्यप और एक छोटी बहन होलिका भी थी ! राजे हिरणाक्ष ने अपने पिता की हार का बदला लेने के लिए अपने पड़ोसी अगड़ी जाति के राजे पर हमला करके अपने पिता की खोई हुई जमीन वापस जीत ली ! युद्ध में हुई हार को वह पराजित राजा बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसने आस पास के एक और अगड़ी जाति के राजे विष्णु की सहायता से हिरणाक्ष को धोखे से कतल करवा दिया ! केवल इतना ही नहीं, उन अनैतिक और कपटी राजे विष्णु ने कुछ और राजाओं के साथ मिलकर हिरणाक्ष के घर में फूट डलवा दी और उसके ही बेटे (प्रहलाद ) को अपने बाप का बाग़ी बनवा दिया ! अपने बड़े भाई की मृत्य के बाद हिरणाक्ष का छोटा भाई हिरणाकश्यप गद्दी पर बैठ गया ! इतना कुछ करने के बाद भी दुशमन राजे विष्णु का मन नहीं भरा, क्योंकि उसकी असल कपटी नज़र तो हिरणाक्ष के विशाल राज्य पर लगी हुई थी, सो इस तरह अपने नए षड्यंत्र को अंजाम देने के इरादे से उसने थोड़ी लंबी अवधि के लिए ही एक नई साजिश रच डाली! बस उसी चालबाज़ी पर अमल करते हुए उन्होंने अपने एक गुप्तचर नारद को हिरण्याक्ष के इकलौते बेटे प्रहलाद को किसी तरह गुमराह करने के काम पर लगा दिया ! बेटा प्रहलाद अपने ही पिता के दुश्मनों के झांसे में धीरे २ आने लग गया और उन्होंने उसे नशेबाजी की गंदी लत्त लगा दी ! केवल इतना ही नहीं, प्रहलाद को उन्होंने अपने ही पिता का विरोधी बनकर घर से भागकर दुश्मनों की साज़िश में फंस गया और अपने पिता के दुश्मनों के साथ मिलकर दारू पीने और जुआ खेलने लग गया !

प्रहलाद की एक भुआ थी जिसका नाम था होलिका ! होलिका अपने इकलौते भतीजे की हरकतों और व्यवहार से बड़ी परेशान रहती थी और वह कभी २ उससे मिलने जाती थी ताकि वह किसी तरह उसे समझाकर वापस घर लाया जा सके ! होलिका की अभी शादी होने वाली थी ! फ़ागुन के महीने में होलिका की शादी होनी निश्चित हो गई थी और उसने अपने मन में प्रण लिया कि वह किसी तरह शादी से पहले अपने भतीजे को उसकी ग़लत फ़हमियां दूर करके पिता / चाचा भतीजे के रिश्तों में पड़े मतभेदों को समाप्त करके प्रहलाद को घर ले आएगी ! बस अपने इसी इरादे से वह प्रहलाद के एक दोस्त और दो अंग रक्षकों को साथ लेकर प्रहलाद को मिलने गई ! शहर से बाहर वह जंगल में अपने जैसे ही एक दगाबाज़ मण्डली के साथ रहता था , होलिका जब प्रहलाद से मिलने आ रही है, इस बात की भनक हिरण्याक्ष के दुश्मनों को भी लग गई और वह भी इस नई उत्पन्न हुई स्थिति से निपटने की तैयारी में जुट गए !

प्रहलाद के छुपने वाले ठिकाने पर पहुँचकर होलिका ने उसे समझाने भुझाने की बड़ी कोशिश की, कि वह यह अपनी नशाखोरी और बाकी सब उलटे काम छोड़कर उसके साथ अपने महल में वापस आ जाये और अपने दुश्मनों को दोस्त समझने की भूल मत करे! प्रहलाद तो इसके लिए राजी नहीं हुआ, क्योंकि उसके दिल में तो अपने पिता और चाचा के प्रति ज़हर भर दिया गया था, जब होलिका तो उसे समझाने में व्यस्त थी, राजा हिरण्याक्ष के दुश्मनों ने उन पर पूरे जोर शोर से हमला कर दिया ! प्रहलाद को तो पकड़कर उन्होंने एक पेड़ के साथ बांध दिया और होलिका के साथ सामूहिक बलात्कार किया ! बाद में इस घिनौनी घटना की ख़बर कहीं उसके चाचा हिरणाकश्यप को न लग जाये, उसके दुश्मनों ने होलिका का कतल भी कर दिया और फ़िर वहीं लकड़ियां इक्कठी करके उसकी बॉडी को जला दिया, ताकि उसके मृत शरीर से होलिका के साथ हुई हैवानियत और दुष्कर्म की कहीं भनक उसके घर वालों का न लग जाये!

बाकी की पूरी कहानी कि प्रहलाद तो विष्णु का भक्त था और होलिका के पास किसी ऋषि मुनि द्वारा प्रदान की हुई एक ऐसी चादर थी जिसे आग भी नहीं जला सकती थी, वगैरह २, ऐसी सब बातों उसके बलात्कार और उसके परिवार के ख़िलाफ़ की गई साजिश का ही एक हिस्सा थी, जिनको अगड़ी जाती वालों ने अपने तथाकथित इतिहास / पौराणिक कथा कहानियों में अपने धोखे और साज़िश को छुपाने के लिए घड़ दिया था, और अनपढ़ किस्म के लोग, सच्चाई की जाँच पड़ताल किये बिना ही उसी को सच मानकर अभी तक मानते और होलिका दहन करके अभी तक उस निर्दोष लड़की का अपमान करते आ रहे हैं ! ऐसी कौन बुआ होती है जिसको अपने भतीजे प्यारे नहीं होते और वह उनको मारना चाहेगी ? बुआ को अपने भतीजे तो भाई से भी ज़्यादा प्यारे होते हैं ! न ही होलिका कोई राक्षसकी थी और न ही उसके पास ऐसी कोई जादुई चादर थी, जिस को ओढ़कर अगर वह अग्नि में भी बैठ जाती तो अग्नि उसको जला नहीं सकती थी ! वह तो केवल अपने परिवार की शुभचिंतक होने के नाते और अपने गुमराह हुए भतीजे को सही रास्ते पर लाना चाहती थी ! और न ही विष्णु कोई भगवान था, वह तो एक कपटी / चालबाज़ राजा था जोकि अपनी राजनैतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए किसी भी तरीके से अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था, और इसके लिए नैतिक /अनैतिक साजिशें उसके लक्ष्यपूर्ति के लिए साधन मात्र ही थी ! यह सब उलटी सीधी बातें अगड़ी जाति वालों ने अपने साजिशों और षड्यंत्रों को छुपाने के लिए और हिरणाक्ष और उसके परिवार को बदनाम करने के इरादे से और अपनी चाल-बाज़ियों पर पर्दा डालने के लिए ही लिखी हुई हैं, जैसे कि अभी तक भी दलितों के साथ आये दिन साजिशें और अत्याचार होते ही रहते हैं और पुलिस / प्रसाशन भी साधन संपन्न लोगों के अपराधों पर अक्सर परदे डालकर उनको बचा लेते हैं और पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिलता !

केवल पुराने ज़माने की ही बातें नहीं, आजतक जब भी किसी गरीब किसान या फिर जंगलों के पास बसे किसी भील / आदिवासी / दलितों / गाँव के सीधे साधे लोगों की जमीन हथियानी हो, तो अमीर / सरमायेदार / दबंग किस्म के लोग पुलिस को घूस देकर उनको आतंकवादी / नक्सलवादी का नाम देकर पहले बदनाम करती है और फिर उनको मरवा भी देते हैं और उनकी जमीनों पर कब्ज़ा कर लेते हैं ! अनेकों बार ऐसे किस्से कहानियां पढ़ने सुनने को हमें मिलते हैं, लेकिन गरीब और साधन विहीन होने के कारण न्याय पाने में अक्सर पिछड़ जाते हैं ; क्योंकि उनके पास न तो अदालतों में केस लड़ने के लिए प्रयात्प धनराशि होती है और न ही वह कोर्ट केस लड़ने के लिए महंगे वकील कर सकते हैं ! अनेकों बार तो ऐसा भी देखा जाता है कि गरीबों की संपत्ति हड़पने वाले चालबाज़ किस्म के लोग अपनी साजिशों पर पर्दा डालते हुए धर्म का लिबास भी ओड़ लेते हैं ताकि अपने अपराध की उनको कोई सजा न मिल सके ! धार्मिक आवरण की वजह से बहुत से लोग उनको संदेह की दृष्टि से भी नहीं देखते ! न जाने कितने ही नेता लोग भी हैं जिन पर कत्तल / बलात्कार / आगजनी / घोटालों इत्यदि के केस चल रहे हैं, और वह बड़े आराम से एमएलए / सांसद / मंत्री बने रहते हैं, पुलिस प्रसाशन भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते ? जैसे अनेकों पुराने किस्से कहानियों पर आधारित टीवी धारावाहिकों में दिखाया जाता है, पीड़ित लड़कियों / महिलाओं / गरीबों को न्याय दिलवाने के कोई देवी देवता अब क्यों नहीं प्रकट होते ? क्या यह देवी देवते भी गरीब अमीर / जातिपाति देखकर ही उनकी सहायता करते हैं ?

महात्मा बुद्ध और होली : महात्मा गौतम बुद्ध का एक प्रसंग भी होली के साथ जुड़ा हुआ है ! गौतम बुद्ध का जन्म तो एक राजा शुद्धोधन के घर हुआ था, जिंदगी को बढ़िया ढंग से जीने के सभी सुख साधन सुविधाएं उनके महल में उपलब्ध थी, लेकिन सिद्धार्थ गौतम का मन हमेशा बेचैन रहता था, वह मानव जीवन में सांसारिक दुःख तकलीफों से अक्सर परेशान रहते थे ! धीरे २ उनके मन को वैराग्य ने घेर लिया और वह मन की शांति और ब्रह्मज्ञान की खोज में ही उन्होंने शादी के थोड़े ही अर्से बाद अपने एक छोटे से बच्चे राहुल और सुंदर पत्नी यशोधरा को महल में अकेले छोड़कर सत्य और अध्यात्मवाद की खोज में आधी रात को घर से निकल गए ! मन की शांति की खोज में वह जंगलों में कितने ही वर्ष भटकते रहे, खाने पीने सोने की सुध बुद्ध भी खो गए ! फ़िर ब्रह्मज्ञान तो उनको सात वर्ष बाद ही प्राप्त हो गया था, लेकिन ज्ञान प्राप्ति के बाद वह पाँच वर्ष तक गाँव २ घूमते हुए आम लोगों को प्रवचन करते रहे, और दुःख तकलीफ़ों से बचने के तरीके लोगों को समझाते रहे !

अंतत: बारह वर्षों की ऐसी घोर तपस्या / वैराग के बाद एक दिन उनको ख्याल आया कि अपने घर की भी खोज ख़बर लेनी चाहिए! वह अपने कुछ साधु सन्यासी मित्रों के संग फागुन महीने के पहले सप्ताह अपने घर कपिलवस्तु में वापस आए ! अपनी पत्नी और बेटे राहुल से मिले ! उनके आने की ख़ुशी में उनके महल में उनके दोस्तों मित्रों और रिश्तेदारों ने मिलकर एक दूसरे को प्रसन्नता का इज़हार करते हुए रंग लगाए और बढ़िया पकवान खाये ! ऐसे बोधि समाज के लोग भी होली का पर्व मनाते हैं !

आरडी भारद्वाज “नूरपुरी”