इन्कलाब के लम्हों पर, क्यूँ इंतज़ार का पहरा है?

यायावर  पत्थर का सीना तोड़ दिया, अब राह बनाना बाकी है| धरती की माटी धधकी है, जल-धार बहाना बाकी है| घर-घर में कैद पड़ी सीता, कूंचे-कूंचे में रावण है| …