हमारा दस बारह दोस्तों का एक ग्रुप है, सुबह लगभग आठ बजे हमलोग पार्क में पहुँच जाते हैं, आधा घंटा सैर करते हैं और फ़िर आधा घंटा हलकी फुल्की कसरत करते हैं और अंत में 20-25 मिंट गपशप / आपस में हंसी मज़ाक / तरह – २ मुद्दों पर विचार विमर्श करके साढ़े नौ बजे के करीब घर की तरफ़ वापसी कर लेते हैं !
ऐसे ही एक दिन जब हम गपशप कर रहे थे तो हमारे पार्क के एक दोस्त ( ढींगरा जी ) ने बोला कि मैं आपको अपने बचपन की एक बात सुनाता हूँ , जोकि बिलकुल सच्ची है और आजकल के हिसाब से आप लोगों को शायद यह बड़ी अजीब भी लगेगी ! हमने कहा, ठीक है चलो सुनाओ ? ढींगरा जी जोकि बठिण्डे (पंजाब) के रहने वाले हैं , वह बोले , “जब मैं सातवीं – आठवीं क्लास में पढ़ता था , तब मेरे पिता जी. जोकि एक आढ़तिये का काम करते थे, एक दिन वह एक नया रेडियो लेकर आये, आप अंदाज़ा लगा सकते हो कि यह कितनी पुरानी बात है, लगभग 1970 से भी पहले की है ! उस वक़्त हमारे गाँव में खरीदा गया यह दूसरा रेडियो था, हमसे पहले केवल हमारे गाँव के सरपंच के घर ही उन दिनों रेडियो होता था और मोहल्ले के बहुत से लोग हमारे घर रेडियो सुनने आ जाया करते थे ! रेडियो में हिन्दी पंजाबी गाने आते थे , ख़बरें आती थीं , देहाती महिलाओं के बहनों का प्रोग्राम व ग्रामीण लोगों के लिए खेतीबाड़ी से सम्बन्धित प्रोग्राम भी आते थे और कभी २ तो नाटक भी आते थे ! मैं और मेरे छोटे सभी भाई बहन सुनकर बड़े हैरान परेशान होते थे, कि यह सब कुच्छ हो कैसे रहा है, क्योंकि उन दिनों आज कल के हालात के मुताबिक ना तो इतने लोग इतने पढ़े लिखे होते थे और ना ही सब विषयों के बारे में ऐसी जानकारी रखने वाले थे, ज़्यादातर लोग सीधे साधे और अनपढ़ या फिर कम पढ़ेलिखे ही थे, तकनीक / विज्ञान के विषयों पर हमारी जानकारी लगभग नामात्र ही थी, लेकिन लोगों में आपसी प्यार मोहब्बत और मिलवर्तन बहुत होता था ! उन दिनों लोग बेजिझक एक दूसरे के घर आ जाया करते थे, बिना संकोच चाय लस्सी वगैरह पी लेते थे। कोई बुरा नहीं मानता था !”
मेरे दिमाग कई दिनों से थोड़ी कुलबुलाहट सी चल रही थी , तो एक दिन मेरी माता जी ने हम सब भाई बहनों को सुनाकर बोला, “देखो ! मुझे अपनी एक सहेली के घर जाना है, कुछ जरुरी काम है, आप सब बैठकर पढ़ाई करो, मैं डेढ़ दो घंटे में आ जायूँगी, आपस में लड़ना नहीं है !” माताजी के घर से बाहर निकलते ही मुझे ख़्याल आया कि बस आज मौका है , रेडियो के बारे में मेरे दिमाग में जो सवाल अक्सर पैदा होते रहते थे, आज मैं उनका उत्तर ढूंढ़ने की कोशिश करूँगा ! अपने घर के पाँच बच्चों में से मैं सबसे बड़ा था , मैंने सब भाई बहनों को बताया कि आज हम इस रेडियो के बारे में अपनी जिज्ञासा का निवारण करेंगे ! सब भाई बहन मेरी तरफ़ गंभीरता से देखने लग गए ! रेडियो हमारे घर की पड़छत्ती पर रखा हुआ था , मैंने एक कुर्सी खींचके उस पड़छत्ती के सामने रख दी और फिर कुर्सी पर खड़े होकर पड़छत्ती से रेडियो उतारा और मेज पर रख दिया ! मेरी एक बहन ने मुझे वार्निंग देते हुए समझाया – भाई ऐसा मत करो , यदि रेडियो को कुछ हो गया , तो फिर पिताजी आपकी पिटाई बहुत करेंगे ! मैंने थोड़ा बेफिक्री से उसे कहा , अरे कुछ नहीं होगा , आप लोग बस आराम से खड़े रहो और देखो आज मैं इस रेडियो में से क्या ढूंढ़ता हूँ ? और फिर पेचकस / प्लास लेकर रेडियो के पीछे लगा ढक्कन खोलने लग गया ! मैंने रेडियो के पीछे लगा वह ढक्कन तो 5-7 मिनटों में ही खुल गया और बड़े ध्यान से / पूरी उत्सुकता से रेडियो के भीतर झाँकने लग गया ! मेरे सभी भाई बहन भी हैरान थे कि आखिर मैं कर क्या रहा हूँ , और वह सभी मुझे बार २ चेतावनी दे रहे थे कि अगर हमारी माता जी या पिताजी आ गए तो पिटाई बहुत होगी , और अगर रेडियो ख़राब हो गया तो समझो हमारी शामत आ गयी ! मुझे मेरे दिमाग में चल रही जिज्ञासा का कोई जवाब नहीं मिला ? अभी मैं सोच ही रहा था कि अब क्या किया जाए , क्योंकि कुछ नहीं मिलने पर उदास होकर रेडियो को बंद करने की कार्यवाही करने लग गया ! पता नहीं क्यों , रेडियो के पीछे वाला ढक्कन बंद ही नहीं हो रहा था ? वह मेरे से फिट नहीं बैठ रहा था ! अब मुझे भी चिंता होने लगी, अगर यह बंद नहीं हुआ और माताजी वापिस आ गई , तो क्या होगा ?
रेडियो का ढक्कन बंद न होने की वजह से मुझे परेशान देखकर मेरी बहन कहने लगी, “भाई अब क्या करोगे ?” फिर मुझे एक आईडिया आया , मेरे गाँव का एक लड़का मेरे से 7-8 वर्ष बड़ा था और वह कॉलेज में पढ़ता था ! मैंने छोटे भाई को बोला , “जाओ , भाग कर जाओ और कस्तूरी लाल को बुलाकर लाओ , उसे कहना कि एक इमरजेंसी है, जल्दी आयो ! भाई भागकर उसके घर गया , इत्तेफाकन कस्तूरी लाल घर मिल गया और वह सीधे हमारे घर आ गया ! उसे देखकर मुझे थोड़ा हौंसला मिला और मैंने उसे बोला , “भाई ! इस रेडियो को जल्दी से बंद कर दो , मेरे से इसका ढक्कन बंद नहीं हो रहा! कोई काम करने से पहले उसने सवाल किया कि रेडियो को आप लोगों ने खोला क्यों था ? मैंने कस्तूरी लाल से बड़े बिनती भरे स्वर में उत्तर दिया , “मैं आपको सब बता दूंगा , लेकिन पहले इसे बंद कर दो , कहीं इसे पहले मेरी माताजी घर वापिस आ गई तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी ! कस्तूरी लाल ने पेचकस उठाया और तीन चार मिनटों मैं सभी खोले हुए पेच बंद कर दिए और रेडियो का ढक्कन अच्छी तरह फिट हो गया ! फिर मैंने उसे रेडियो को पड़छत्ती पर रखने के लिए अनुरोध किया और उसने रेडियो वहां अच्छी तरह रखकर उसकी तार स्विच में लगा दी, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो !
रेडियो पड़छत्ती पर टिकाकर मेरे दोस्त कस्तूरी लाल ने फिर अपना सवाल दोहराया , ” अब बताओ, आप लोगो ने इसको खोला क्यों था ? मैंने दोस्त को बताया कि जब से पिताजी यह रेडियो खरीद कर लाये हैं , मुझे बड़ी हैरानगी होती है कि – इस रेडियो में गाने आते हैं , समाचार आते हैं , किसान भाईओं के लिए खेतीबाड़ी के प्रोग्राम भी आते है , गाना गाने वाले कभी आदमी होते हैं , तो कभी औरतें , वोह लोग ढोलकी और हारमोनियम भी बजाते हैं , मुझे समझ नहीं आया कि इतने सारे लोग एक छोटे से रेडियो , जोकि एक फुट चौड़ा , डेढ़ फुट लंबा और केवल दस इंच ऊँचा है, इसमें इतने सारे लोग कैसे बैठते होंगे , फिर मेरे दिमाग में बात आई की शायद वह लोग बौने होंगे, छोटे आकार के, इसलिए वहाँ जैसे तैसे करके वह इसके भीतर बैठ जाते होंगे , लेकिन जब इसको खोला तो देखा कि इसमें तो कोई आदमी , ढोलकी या उनके द्वारा बजाये जाने वाले इंस्ट्रूमेंट्स वगैरह तो कुछ भी देखने को नहीं मिला ? मेरी बात सुनकर वह दोस्त पहले तो पागलों की तरह खूब हंसा, और फिर उसने हमें समझाया कि जिन लोगों के भी इसमें प्रोग्राम आते हैं , वह सभी ऑल इंडिया रेडियो जालंधर के स्टूडियो में बैठकर अपना प्रोग्राम करते हैं / गीत गाते हैं, और वही प्रोग्राम हमें इस छोटे से इस यंत्र रेडियो के माध्यम से अपने घर में सुनाई देता है !
कस्तूरी लाला का उत्तर सुनकर हम सभी भाई बहन हक्के बक्के रह गए ! फिर मैंने उस दोस्त से निवेदन किया कि मेरे द्वारा रेडियो खोलने की बात को मेरे माता पिता में से किसी को नहीं बताना , वरना हमारे लिए बड़ी परेशानी खड़ी हो जाएगी ! कस्तूरी लाल ने वादा किया कि वह इसके बारे में किसी को कुछ नहीं बताएगा और जब वह अपने घर जाने ही वाला था , तो मेरे माता जी भी अपनी सहेली के घर से वापिस घर आ गई और हमने माता जी को देखकर झट से मेज पर रखे हुए पेचकस और प्लास छुपा दिए !
आरडी भारद्वाज “नूरपुरी “




