प्रकृति की पूजा ‌देश और मानवता की सेवा: राजेश शर्मा ने पाॅजिटिव मीडिया के मंच पर प्रकृति भक्ति का संकल्प दिलाया

प्रकृति की रक्षा केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र और संपूर्ण मानवता की सेवा है। यह संदेश आरजेएस पॉजिटिव मीडिया ब्राडकास्टिंग हाउस (आरजेएस पीबीएच)के स्वतंत्रता पखवाड़े के तहत 13अगस्त को आयोजित ‘प्रकृति की पूजा, देश की सेवा’ विषयक संवाद में प्रमुखता से उभरा। कार्यक्रम में वक्ताओं ने वृक्षारोपण, जल संरक्षण, जैव विविधता की रक्षा, ऊर्जा की बचत, बच्चों में पर्यावरणीय संस्कार विकसित करने और आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने को प्रकृति संरक्षण का आधार बताया। संवाद के दौरान लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की 13 अगस्त पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी गई। 

मुख्य अतिथि प्रकृति भक्त फाउंडेशन के संस्थापक राजेश शर्मा, एसोसिएशन ऑफ वॉलंटरी एजेंसीज फॉर रूरल डेवलपमेंट (अवार्ड) के अध्यक्ष डॉ. बिशेश्वर मिश्रा, आरजेएस पॉजिटिव ब्रांच नोएडा के मानद प्रभारी उदय शंकर सिंह कुशवाहा, डा.मुन्नी कुमारी,राजेंद्र सिंह कुशवाहा ,और दिनेश कुमार कुशवाहा सहित कई प्रतिभागियों ने अपने विचार रखे। चर्चा का केंद्र यह था कि भारतीय समाज में प्रकृति के प्रति पारंपरिक श्रद्धा को व्यवहारिक संरक्षण में कैसे बदला जाए।

राजेश शर्मा ने आरजेएस पॉजिटिव मीडिया के मंच पर प्रकृति भक्ति का संकल्प दिलाया। उन्होंने प्रकृति को ‘मां’ का दर्जा देते हुए कहा कि पृथ्वी पर मौजूद हर जीव किसी न किसी रूप में प्रकृति पर निर्भर हैं। उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के संदर्भ में देश के लिए बलिदान देने वाले शहीदों को याद करते हुए कहा कि सेवा और त्याग की भावना को प्रकृति की रक्षा से भी जोड़ा जाना चाहिए। नोएडा पॉजिटिव ब्रांच के मानद प्रभारी उदय शंकर सिंह कुशवाहा ने बताया कि उनकी शाखा की छत पर विभिन्न पौधे लगाए गए हैं। उन्होंने चीकू, इलायची, मिर्च, घिया, तोरी और अन्य पौधों का उल्लेख करते हुए कहा कि शहरी क्षेत्रों में सीमित स्थान के बावजूद लोग प्रकृति के लिए जगह बना सकते हैं। मुख्य वक्ता डॉ. बिशेश्वर मिश्रा ने कहा कि मनुष्य का जीवन प्रकृति के बिना संभव नहीं है और भारत की परंपरा में पहाड़ों, वृक्षों, पशुओं सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के प्रति सम्मान की प्राचीन व्यवस्था रही है। उन्होंने कहा कि प्रकृति की सेवा को केवल देश की सेवा तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि पर्यावरण की रक्षा अंततः पूरी मानवता की रक्षा है। उनके अनुसार विकास तभी टिकाऊ हो सकता है जब वह प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करे।मिश्रा ने प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल पर जोर देते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी संसाधन बचाना समाज की जिम्मेदारी है। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रकृति से उतना ही लिया जाना चाहिए जितनी वास्तविक आवश्यकता हो। जल संरक्षण, जंगलों की रक्षा और प्राकृतिक संसाधनों के दुरुपयोग को रोकने को उन्होंने भविष्य की सुरक्षा से जोड़ा।

राजेश शर्मा ने चेतावनी दी कि प्रकृति को नजरअंदाज करके किया गया विकास अंततः विनाश में बदल सकता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को प्रकृति के साथ अपनी कनेक्टिविटी फिर से स्थापित करनी होगी। उनके अनुसार जंगल, नदियां, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे प्राकृतिक व्यवस्था के साथ चलते हैं, लेकिन मनुष्य ने बढ़ती जरूरतों और उपभोग की प्रवृत्ति के कारण प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष की स्थिति पैदा कर दी है।राजेंद्र सिंह कुशवाहा ने जंगलों में समय बिताने, पौध लगाने और उनकी देखभाल करने की अपनी गतिविधियों का उल्लेख किया। उन्होंने औषधीय पौधों के महत्व पर भी जोर दिया और बताया कि उनके घर की बालकनियों में तुलसी सहित कई पौधे लगाए गए हैं। उनका कहना था कि पौधों का महत्व केवल हरियाली तक सीमित नहीं है, बल्कि अनेक पौधों में औषधीय गुण भी पाए जाते हैं।

संवाद में यह बात भी सामने आई कि पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत छोटे-छोटे व्यक्तिगत कदमों से हो सकती है। दिनेश कुमार कुशवाहा ने कहा कि प्रकृति की सेवा घर से शुरू की जा सकती है। आवश्यकता नहीं होने पर बिजली की लाइट बंद करना, ऊर्जा की बचत करना, पानी का दुरुपयोग रोकना और नदियों को प्रदूषित न करना जैसे छोटे कदम महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि नदियों की सफाई के अभियान तभी जरूरी पड़ते हैं जब समाज पहले उन्हें गंदा करता है; इसलिए प्रदूषण रोकना सफाई अभियान से भी अधिक प्रभावी उपाय हो सकता है।

जल संरक्षण को वक्ताओं ने पर्यावरणीय सुरक्षा का प्रमुख आधार बताया। डॉ. मिश्रा ने कहा कि पानी के बिना न खेती संभव है, न पशुओं का जीवन और न ही मानव जीवन। इसलिए जल संचयन और जल के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जल संसाधनों को इस तरह सुरक्षित रखना होगा कि आने वाली पीढ़ियों को भी पर्याप्त पेयजल मिल सके।

राजेश शर्मा ने विकास परियोजनाओं के कारण होने वाली वृक्ष कटाई पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सड़क, मेट्रो, रेलवे या अन्य विकास कार्यों के दौरान यदि पेड़ काटे जाते हैं तो उसके बदले अधिक संख्या में पेड़ लगाने और उनकी देखभाल की स्पष्ट जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्होंने स्कूलों, शिक्षकों, सरकारी कर्मचारियों, सेवानिवृत्त अधिकारियों और उद्योगों सहित विभिन्न वर्गों को वृक्ष संरक्षण से जोड़ने का सुझाव दिया।

संवाद में बच्चों की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया। शर्मा ने कहा कि भारत युवाओं का देश है और बच्चों में ऊर्जा तथा सकारात्मक बदलाव की क्षमता बहुत अधिक है। उन्होंने अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि जब बच्चों को नदियों, पहाड़ों, झरनों और जंगलों के करीब ले जाया जाता है तो उनके भीतर प्रकृति के प्रति स्वाभाविक लगाव पैदा होता है।

उन्होंने सुझाव दिया कि बच्चों को केवल पुस्तकों के माध्यम से पर्यावरण न पढ़ाया जाए, बल्कि उन्हें पौधे लगाने, पानी देने, ऊर्जा बचाने और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने की व्यावहारिक गतिविधियों से जोड़ा जाए। स्कूलों में वृक्षारोपण के लिए बच्चों को प्रोत्साहन और पुरस्कार देने की व्यवस्था भी की जा सकती है। उद्योगों को भी उनके प्रदूषण के अनुपात में पर्यावरणीय जिम्मेदारी सौंपने की बात कही गई।

डॉ. मिश्रा ने प्रारंभिक शिक्षा में पर्यावरण और प्रकृति के महत्व को शामिल करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कोल्हापुर में बच्चों से प्लास्टिक एकत्र कराने जैसी गतिविधियों का उदाहरण देते हुए कहा कि इस प्रकार के प्रयोग बच्चों को पर्यावरणीय जिम्मेदारी समझाने में मदद कर सकते हैं।

भारत में हरित क्षेत्र की स्थिति पर चर्चा करते हुए मिश्रा ने कहा कि बढ़ती जनसंख्या और भोजन तथा भूमि की जरूरत के कारण जंगलों पर दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई। साथ ही उन्होंने कहा कि जंगल, पहाड़, नदी, मैदान, मिट्टी और जल को अलग-अलग नहीं बल्कि एक पूरी पारिस्थितिक श्रृंखला के रूप में देखना होगा।

दिनेश कुमार कुशवाहा ने नई पीढ़ी के सामने मौजूद चुनौती का उल्लेख करते हुए कहा कि बच्चों का झुकाव तेजी से कृत्रिम और तकनीक-प्रधान जीवन की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने पेड़ों को ‘गोद लेने’ की परंपरा शुरू करने का सुझाव दिया। उनके अनुसार स्कूल, कार्यालय, सरकारी विभाग और अन्य संस्थाएं अपने आसपास के कुछ पेड़ों की जिम्मेदारी लेकर नियमित रूप से उनकी गुड़ाई, खाद, पानी और सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती हैं।

उन्होंने धार्मिक आस्था से जुड़े पर्यावरणीय मुद्दों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि पूजा और आस्था को रोका नहीं जा सकता, लेकिन मूर्ति विसर्जन के कारण नदियों, तालाबों और समुद्र में होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए छोटी और पर्यावरण-अनुकूल मूर्तियों तथा अन्य विकल्पों को अपनाया जा सकता है।

दिनेश कुमार कुशवाहा ने अंगदान को भी सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी से जोड़ते हुए कहा कि मृत्यु के बाद शरीर के उपयोगी अंग दूसरों का जीवन बचा सकते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अंगदान और देहदान की परंपरा को बढ़ावा देने से चिकित्सा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है और पारंपरिक अंतिम संस्कार में इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक संसाधनों पर भी कुछ दबाव कम हो सकता है।

कार्यक्रम में स्वैच्छिक रक्तदान को लेकर भी जानकारी दी गई। उदय मन्ना ने बताया कि आरजेएस पॉजिटिव मीडिया की ओर से इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी के साथ समझौते और स्वैच्छिक रक्तदान जागरूकता अभियान की दिशा में काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अभियान के तहत परिवारों और समाज के लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित किया जाएगा तथा प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र के माध्यम से सम्मानित किए जाने की योजना है।

वक्ताओं ने उनके प्रशासन, न्यायप्रियता और जनकल्याणकारी कार्यों को याद करते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन में सेवा और सकारात्मक सोच के कारण ही ऐसे व्यक्तित्व पीढ़ियों तक याद किए जाते हैं।

शहरी और बहुमंजिला इमारतों में रहने वाले लोगों के लिए शर्मा ने कहा कि पेड़ लगाने के लिए अपने घर में जमीन होना अनिवार्य नहीं है। उन्होंने लोगों से आसपास के पार्कों और सार्वजनिक स्थानों में पौधे लगाने तथा उनकी जिम्मेदारी लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि बालकनी और घर के भीतर भी उपयुक्त पौधे लगाए जा सकते हैं। शर्मा ने लोगों से आग्रह किया कि वे प्रकृति सेवा के लिए अपनी पसंद का कोई एक नियमित कार्य चुनें—जैसे पेड़-पौधों को पानी देना, वृक्ष लगाना, पक्षियों के लिए पानी रखना, जीवों की सेवा करना या किसी अन्य पर्यावरणीय गतिविधि से जुड़ना। उनके अनुसार नियमित व्यवहार में शामिल किया गया ऐसा छोटा प्रयास धीरे-धीरे प्रकृति के प्रति स्थायी सोच विकसित कर सकता है।

सरकार की भूमिका पर चर्चा करते हुए डॉ. मिश्रा ने कहा कि सौर ऊर्जा, जैविक खेती, जल संरक्षण और पौधरोपण से संबंधित विभिन्न योजनाएं और कार्यक्रम चल रहे हैं। प्रकृति के संरक्षण के लिए जनभागीदारी सर्वोपरि है।