आरजेएस पीबीएच और डीएमई नोएडा का आजादी पर्व, भारतीयता और सकारात्मक मूल्यों को बढ़ाने पर संगीतमय प्रस्तुति के साथ हुआ

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस से पूर्व, आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया के अंतरराष्ट्रीय पखवाड़े के सातवें दिन मीडिया के लोकतंत्रीकरण, सकारात्मक मूल्य, डिजिटल नैतिकता, भारतीयता सकारात्मकताऔर देशभक्ति की बदलती परिभाषा पर एक उच्च स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन नोएडा स्थित दिल्ली मेट्रोपॉलिटन एजुकेशन के ऑडिटोरियम में किया गया। यह कार्यक्रम राम जानकी संस्थान पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस, (आरजेएस पीबीएच)के संस्थापक व राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना के सफल संचालन व संयोजन में आयोजित किया गया। राष्ट्र गान जन गण मन के रचयिता रवीन्द्र नाथ टैगोर की पुण्यतिथि 7 अगस्त पर गुरूदेव को मन्ना ने शत् शत् नमन किया और कहा कि गुरूदेव ने ही पहली बार वंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना वंदे मातरम् को 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में गाया था। आरजेएस पाॅजिटिव ब्रांच नोएडा के प्रभारी उदय शंकर सिंह कुशवाहा ने बताया कि पाॅजिटिव मीडिया श्रृंखला की सातवीं पुस्तक का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया, जो 212 पृष्ठों का दस्तावेज है और इसमें आंदोलन के व्यापक आउटरीच कार्यक्रमों, स्वतंत्रता सेनानियों और समकालीन बदलाव लाने वालों की जीवनी का विवरण है। अतिथियों के कर कमलों से सभी टीफा 26 को स्टेज पर प्रदान किया गया। इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी के सहयोग से जल्दी ही स्वैच्छिक रक्तदान जागरूकता के लिए संकल्प दुहराया जाएगा जो सकारात्मक इरादे को ठोस सामाजिक कार्रवाई में बदल देगा। आरजेएस पाॅजिटिव मीडिया प्रभारी प्रखर वार्ष्णेय ने बताया कि पाॅजिटिव मीडिया का ये आजादी पर्व भी वंदे मातरम् से आरंभ हुआ और डीएमई एनएसएस की छात्राओं गोपिका विजय और मेहक वार्ष्णेय, विभूति माहेश्वरी, सिद्धि गुप्ता और आरजेएस की अल्फा जेनेरेशन मानुषी ने देशभक्ति के मनमोहक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश व डीएमई के महानिदेशक भंवर सिंह ने की और मुख्य अतिथि इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली के निदेशक प्रोफेसर (डा.) के जी सुरेश थे। आजादी पर्व के कार्यक्रम को डीएमई की निदेशक प्रोफेसर डा कोमल विग और डीएमई मीडिया स्कूल की प्रोफेसर और हेड प्रोफेसर ( डा) पारूल मेहरा ने भी सभा को संबोधित किया। आरजेएस पीबीएच के राष्ट्रीय पर्यवेक्षक दीप माथुर ने अतिथियों का स्वागत करते हुए इस विचार को पुष्ट किया कि भारतीयता की शुरुआत घर से होती है, सत्य की खेती, बड़ों के सम्मान और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के माध्यम से। उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय प्रवासी विश्व स्तर पर सांस्कृतिक राजदूत के रूप में कार्य करते हैं और भारतीयों का सम्मान बढ़ाने में लगे हैं। इस अवसर पर 

कार्यक्रम में आरजेएस पाॅजिटिव ब्रांच को सम्मानित किया गया। नोएडा के मानद प्रभारी उदय शंकर सिंह कुशवाहा व धर्मपत्नी श्रीमती मीना कुशवाहा ने ये सम्मान ग्रहण किया।

उन्होंने लोगों से आरजेएस पाॅजिटिव ब्रांच को मजबूत करने का आग्रह किया ताकि स्थानीय प्रतिभाओं के आगे लाया जा सके। उन्होंने टीआरडी 27 में शामिल होने के लिए दस्तावेजीकरण के दो कार्यक्रम को-ऑर्गेनाइज करने का संकल्प दिलाया।आगामी गणतंत्र दिवस पर आठवीं पुस्तक की तैयारी पिछले एक अगस्त से शुरू कर दी गई है। 

मुख्य अतिथि इंडिया हैबिटेट सेंटर के निदेशक और भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक प्रोफेसर डॉ. के.जी. सुरेश ने कहा कि भारतीयता केवल नारे लगाने, तिरंगा फहराने या क्रिकेट की जीत का जश्न मनाने तक सीमित नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि सच्ची भारतीयता एक गहरी सहानुभूति और नागरिक कर्तव्य के प्रति प्रतिबद्धता है।उन्होंने कहा कि शासन अक्सर इसलिए विफल होता है क्योंकि नागरिक योग्यता के बजाय जाति के आधार पर वोट देते हैं। भारतीयता की समावेशी प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए, प्रोफेसर सुरेश ने मिजोरम के पूर्व मुख्यमंत्री लाल थनहावला के साथ एक मार्मिक बातचीत को याद किया, जिन्होंने उनसे पूछा था कि एक भारतीय कैसा दिखता है ?प्रोफेसर सुरेश ने जोर देकर कहा कि भारत ने ऐतिहासिक रूप से पारसियों से लेकर यहूदियों तक विविध समूहों को आत्मसात किया है, इस एकीकरण की तुलना दूध में घुलने वाली चीनी से की।

उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और डीएमई के महानिदेशक जस्टिस भंवर सिंह ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियादी समझ के बिना आर्थिक प्रगति और राष्ट्रीय अखंडता असंभव है।जस्टिस सिंह ने गुमनाम नायकों की स्मृति को पुनर्जीवित किया। उन्होंने राजमणि की चर्चा की जो परिवार के गहने आजादी की लड़ाई में दान कर एक जासूस के रूप में इंडियन नेशनल आर्मी में शामिल हो गई।एक लड़के के भेष में, उसने ब्रिटिश शिविरों में घुसपैठ की, उनके जूते पॉलिश किए, और अत्यधिक गोपनीय दस्तावेज चुराए, और अंततः एक गोली लगने के बावजूद वहां से बच निकली। ऐसे बलिदानों को याद करके, वर्तमान पीढ़ी में राष्ट्र प्रथम की भावना जगाई जा सकती है।डीएमई की निदेशक प्रोफेसर डॉ. कोमल विग ने छात्रों से भारत की समृद्ध विरासत पर गर्व करने और राष्ट्र को खंडित करने की कोशिश करने वाली विभाजनकारी ताकतों के प्रति सतर्क रहने की अपील की। डीएमई मीडिया विभाग की प्रमुख प्रोफेसर डॉ. पारुल मेहरा ने कहा कि माइक्रोफोन अब केवल बड़े मीडिया घरानों की संपत्ति नहीं है; यह स्मार्टफोन और इंटरनेट कनेक्शन वाले किसी भी व्यक्ति के हाथ में मौजूद है।उन्होंने तर्क दिया कि यह आधुनिक मीडिया का सबसे उज्ज्वल पक्ष है, जो आवाजहीनों को आवाज देता है। उन्होंने युवाओंसे आग्रह किया कि वे ऑनलाइन कुछ भी साझा करने से पहले क्राॅस चेक और राष्ट्र प्रथम के सिद्धांत को लागू करें।

यह कार्यक्रम राष्ट्र की स्थिति पर एक शक्तिशाली संवाद के रूप में कार्य कर गया। यह स्वतंत्रता दिवस की पारंपरिक बयानबाजी से आगे बढ़कर डिजिटल युग की जटिल वास्तविकताओं का सामना करने के लिए था, जिसने यह मांग की कि युवा अपने स्मार्टफोन को निष्क्रिय खपत और अराजक आक्रोश के उपकरण से बदलकर नैतिक संचार, नागरिक जिम्मेदारी और एकीकृत राष्ट्रीय प्रगति के उपकरण में परिवर्तित करें।